शनिवार, 13 जुलाई 2013

ईश्वर की अवधारणा की व्यापक स्वीकार्यता

हे मानवश्रेष्ठों,

संवाद की इन्ही श्रृंखलाओं में, कुछ समय पहले एक गंभीर अध्येता मित्र से ‘ईश्वर की अवधारणा’ और इसकी व्यापक स्वीकार्यता के संदर्भ में एक संवाद स्थापित हुआ था। अब यहां कुछ समय तक उसी संवाद के कुछ संपादित अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



ईश्वर की अवधारणा की व्यापक स्वीकार्यता

आप सही समझे, कि, मैं अपने इर्द गिर्द की दुनिया में ईश्वर नाम की इस अवधारणा की सर्वव्यापी व सबको प्रभावित करती उपस्थिति पाता हूँ... मैंने इस अवधारणा के बारे में जो नतीजा निकाला है वह भी आपको बता ही दिया है मैं जब भी ईश्वर के बारे में सोचता हूँ तो मुझे यही नतीजा मिलता है, पर आपके समक्ष यह जिज्ञासा रखने का कारण यह है कि मैं संशय में हूँ... कारण कई हैं... पहला, मुझे कुछ और मजबूत आधार व तर्क चाहिये... दूसरा, ठीक अपनी ही जैसी पृष्ठभूमि, शिक्षा, सामाजिक परिवेश व अनुभव रखने वाले अधिकाँश को मैं आस्तिक पाता हूँ व उनमें से कोई ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में कोई प्रश्न या द्वंद भी नहीं रखता, उनके लिये ईश्वर ठीक उसी तरह साफ साफ मौजूद है जैसे सूर्य,तारे, समंदर और आसमान, मेरे परिवार में भी सभी ऐसे ही हैं, मुझमें इन लोगों से यह भिन्नता क्यों है, क्या मेरी विचार प्रक्रिया सामान्य से हट कर तो नहीं...क्यों जो मैं देख-समझ पाता हूँ वह नहीं देख-समझ पाते, और, क्यों जिस तरह के अनुभवों की बात वे करते हैं, मुझे नहीं मिलते... विचार प्रक्रियाओं में इतनी बड़ी भिन्नता क्यों...

हम इसी मंतव्य के साथ संवाद शुरू कर ही चुके हैं, जाहिरा-तौर पर हम निश्चित ही इस मामले में और समृद्ध होंगे। यह और भी आसान हो जाएगा, यदि आप अपने संशयों, आधारों एवं तर्कों की कमी-बेशी पर, जहां आपको लगता है कि यहां इसे और मजबूत होना चाहिए, या इस बारे में कुछ और अधिक जानने-समझने की आवश्यकता है। और यह आप चलते हुए संवाद के बीच में अलग से भी प्रस्तुत करते रहें तो बेहतर, जैसे भी जब भी किसी बात पर कुछ सूझे, आप पेश कर सकते हैं।

हालांकि यह भली-भांति परिलक्षित हो रहा है कि आप चीज़ों को बेहतरी से देखने और उनके पीछे झांकने का एक उम्दा सामर्थ्य रखते हैं, फिर भी हम चाहेंगे कि इन लिंको पर की हल्की-फुल्की सामन्यीकृत सामग्री से एक बार गुजर लें। हो सकता है आपको वहां कुछ इशारे मिलें, जो कि इन सवालों से जूझने के लिए कुछ सामान्यीकृत आधार पैदा कर सकें।


मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन-यापन के लिए, सहजवृत्तिक व्यवहार-संरूपों पर अवलंबित नहीं है। वह लगभग शून्य से शुरू करता है, और सभी चीज़ें, जैसे चलना, बोलना, व्यवहार के तरीकें, आदि, अपने परिवेशगत लोगों से सीखता है। इन्हीं से वह आस्थाओं, परंपराओं, विचारों आदि को भी ग्रहण करता है। उसके पास अपना कुछ नहीं होता, इसी पृष्ठभूमि से प्राप्त यही व्यवहार-संरूप उसके अपने बन जाते हैं। सामान्यतः सभी अपने परिवेश के अनुकूलन में होते हैं, इसीलिए सामान्यतः सभी आस्तिक आधारों के साथ होते हैं।

एक और बात साथ चल रही होती है। व्यष्टि, अपने आसपास की चीज़ों के प्रति असीम जिज्ञासाओं से भरा, हर चीज़ को जांचने-परखने, जानने-समझने की प्रक्रिया में होता है। यह अनुकूलन की प्रक्रिया के साथ ही चल रही होती है। बोलना शुर करते ही, यानि भाषा के साथ परवान चढ़ते हुए, उसके सवाल परिवेश के माथे चढ़कर बोलने लगते हैं। सामान्यतः हर परंपरा पर, आस्था के हर आधारों पर सवाल उठाए जाते हैं। परिवेश विभिन्न तरीकों से इसका कठोर निपटारा करता रहता है। समान्यतः मनुष्य के जिज्ञासू स्वभाव को कुचल दिया जाता है, या जिज्ञासाओं को तात्कालिकऔर काल्पनिक समाधानों की श्रृंखलाओं से लबरैज कर दिया जाता है और उसे अनुकूलित होने को अभिशप्त कर दिया जाता है। कहने का मतलब यह है कि परिवेश द्वारा आस्तिक, बाक़ायदा तैयार किए जाते हैं।

अब एक और बात परिदृश्य में उभरती है। आधुनिक हालात में, बात यहीं नहीं रुकती, मानवजाति के अद्युनातन ज्ञान के साथ कदमताल बैठाने के लिए, एक औपचारिक शिक्षा प्रणाली अस्तित्व में है। इसके लिए वह बाहर निकलता है, परिवेश व्यापक बनता है, समाज की परिधियों में पहुंचता है। साथ ही आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साये में पहुंचता है। ये सब मिलकर उस पर अपना प्रभाव डालते हैं। यह आप जानते ही हैं कि सामान्यतः यह सब बाहरी प्रभाव भी उसके आस्तिक अनुकूलन में मदद ही करते हैं। बाहरी समाज, शिक्षक सब इसी आस्तिक अनुकूलनता के साथ होते हैं। यहां भी शुरुआती तौर पर उसी तरह सवाल उठाए जाते हैं, मिल रही शिक्षा के साथ दुनिया से तालमेल मिलाने की कोशिश की जाती हैं, पर इस बाहरी परिवेश द्वारा भी, और साथ ही आंतरिक परिवेश द्वारा भी सवालों पर बरगलाने का रास्ता अख़्तियार किया जाता है। अधिक से अधिक यह हो पाता है कि व्यक्ति के दिमाग़ में दो खाने बन जाते है, एक शिक्षा-विज्ञान को ऊपरी तरह रट-रटाकर अपने लिए रोजगार पाने के जरिए का, और दूसरा उसी सामंती, आस्तिक संस्कारों से लबरैज जिनसे कि वास्तविक दुनियादारी चल रही है, आपसदारी चल रही है। जहां सभी के जैसा ही होना अधिक सहज और आसान हो उठता है, स्वाभाविक सा हो उठता है।

उपरोक्त बात से अब यह निकालना और समझना शायद आसान हो उठे, कि जिज्ञासा और दमन-अनुकूलन के इस अंतविरोध के बीच, शिक्षा की इस परिपाटी और वास्तविक ज्ञान के आत्मसात्करण के इस द्वंद में, कुछ विशिष्ट, विरल पारिस्तिथिक, और वयक्तिगत अवदान ऐसे भी संभव हो सकते हैं जो इस अनुकूलन में व्यवधान पैदा करते हों, जिज्ञासाओं के वैज्ञानिक शमन और शिक्षा को ज्ञान से जोड़ने तथा व्यवहार में परखने की राह से जोड़ते हों। ऐसे में ही इस तरह की वैयक्तिक जुंबिशे भी परवान चढ़ सकने की संभावनाएं भी हो सकती हैं जो इस प्रक्रिया को और आगे भी परवान चढ़ाए, अपने को अधिक अद्यतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करने की राह पर ले जाएं। यानि कि इन परिस्थितियों में ही इसके बीज मौजूद होते हैं, क्योंकि समाज में , परिवेश में, सभी तरह की धाराएं प्रवाहित हो रही हैं। कौन किससे अछूता रह जाए, और कौन कब किसके चपेट में आ जाए, यह उसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और संयोगों पर निर्भर करता है।

आप इसमें से अपनी अवस्थिति को देख-परख सकते हैं। आप अपनी ज़िंदगी में बारीकी से झांककर, शायद उन तत्वों, व्यक्तियों, परिस्थितियों, संयोगों की पहचान कर सकते हैं जो कि आपकी इस सामान्य से हटकर विचार प्रक्रिया के आधार रखने में अपना योगदान कर चुकी हैं। जिनकी विशिष्टता और आपके लिए सांयोगिक उपलब्धता ने, आपको अपने जैसी लगभग समान पृष्ठभूमि, शिक्षा, सामाजिक परिवेश व अनुभव रखने वाले हमसायों से थोड़ा भिन्न बना दिया है। सामान्यतः एक जैसी लगती परिस्थितियों के बीच भी, कई विशिष्ट सक्रियताएं और प्रभाव एवं इनसे पैदा हो गई कई वैयक्तिक विशिष्टताएं, इन्हें आदर्श रूप में इतना भी एक जैसा नहीं रख पाती, और इतने भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व गढ़ा करती हैं।

सामान्यतः यह पारिस्थितिक अनुकूलन ही, किसी भी व्यक्ति की, उसके व्यक्तित्व की पहचान बन जाता है। वह इसी अनुकूलन के साथ रहने और जीने का आदी हो जाता है, उसकी यह अनुकूलित विचार-प्रक्रिया, इसी अनुकूलन के साथ सहजता अनुभव करती है। उसके जैसे ही बहुत से लोगों के बीच, एक सांमजस्यता, एक जैसी आपसदारी पैदा करती है। साथ ही जीवन की आर्थिकी और सामाजिकता उनके बीच इस तरह की नाभीनालबद्धता पैदा कर देती है कि वह अपने संशयों को ( अगर उठते भी हैं तो ) तिलांजलि देना, या व्यक्तिगतता के साथ दबाए रखने को अभिशप्त होता है। उनको अभिव्यक्त करना सामाजिक रूप से उसके लिए फायदे का सौदा नहीं रहता, ना ही सामान्य रूप से इन संशयों के समाधान उपलब्ध होते हैं जिनसे कि वह दो चार हो कर इन्हें सुलझाने की कोशिश भी कर सके। वह रूढ़ होता जाता है, और सामान्य सामूहिक चेतना के हिसाब से ही अपनी व्यवहार-सक्रियता को ढ़ाल लेता है। ऐसे में यदि यह सब उसके जीवन की गणित में भी जुड़ता है, उसके वैयक्तिक अहम् का हिस्सा भी बन जाता है तो वह सचेतन रूप से ऐसी धाराओं के विरोध में भी उतरता है जो इन संशयों को उभारते हैं, इस अनुकूलनता के खिलाफ़ विचार व्यक्त करते हैं। वह उनके खिलाफ़ अपनी तार्किकी गढ़ता है, विशिष्ट अनुभवों का घटाघोप भी रचता है।

इसीलिए हम अपने चारों तरफ़ ऐसे प्रयासों को देखते हैं जो अपनी इस आस्तिकता, अपने इस अनुकूलन पर आंच आते देखते ही सचेत हो उठते हैं। यह सहज भी है, व्यक्ति को अपनी वैयक्तिकता और व्यक्तिगत पहचान के आधारों पर जब चोट पहुंचती दिखती है तो वह इन्हें अपने संपूर्ण अस्तित्व पर ही खतरा समझता है, उसे अपना अस्तित्व ही खतरे में नज़र आने लगता है और वह भरसक, येन-केन प्रकारेण इसका प्रतिकार करने की कोशिशे करता है। यह उसका अधिकार भी है। इसीलिए वह अपनी इसी ऊलजलूली में कैसी भी तार्किकी गढ़ सकता है, अनुकूलित तर्क प्रणाली को काम में ले सकता है, इस तरह के कई आनुभाविक भ्रमों की रचना और अभिव्यक्ति कर सकता है जो कि, जैसा कि आपने कहा भी है वे आपसे नहीं मिलते। जब लक्ष्य अनुकूलन तथा अस्तित्व को बचाने से जु़ड जाते हैं, तो जाहिरा तौर पर उनकी और इस अनुकूलन के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले लोगों की विचार-प्रक्रियाएं भी अलग-अलग दिशा अख़्तियार कर लेती हैं। भिन्नताएं पैदा कर लेती हैं।

आपने काफी विस्तार से उत्तर दिया है, मेरे अधिकतर सवालों का जवाब मिला मुझे... मैं कुछ बेहतर अनुभव कर रहा हूँ...

आप चाहे तो इस मामले में रह गये संशयों को, सवालों को, अधिक मुतमइन ना कर सक पाने वाले समाधानों की कमजोरियों को, अधिक खोल कर रख सकते हैं। इस पर संवाद को आगे बढ़ा सकते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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