शनिवार, 20 जुलाई 2013

ईश्वर की अवधारणा और इसके विकास का स्वरूप - १

हे मानवश्रेष्ठों,

संवाद की इन्ही श्रृंखलाओं में, कुछ समय पहले एक गंभीर अध्येता मित्र से ‘ईश्वर की अवधारणा’ और इसकी व्यापक स्वीकार्यता के संदर्भ में एक संवाद स्थापित हुआ था। अब यहां कुछ समय तक उसी संवाद के कुछ संपादित अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



ईश्वर की अवधारणा और इसके विकास का स्वरूप - १

आप जब कहते हैं, कि, "ईश्वर की अवधारणा, मनुष्य के ऐतिहासिक विकास की परिस्थितियों की स्वाभाविक उपज है, जिस तरह की मनुष्य का मस्तिष्क भी इन्हीं की उपज है।" तो मुझे आपसे असहमत होना पड़ेगा... मानव मस्तिष्क का विकास नि:संदेह मानव के विकास का स्वाभाविक परिणाम है... जैव विकास के सर्वोच्च स्तर पर खड़ा मानव... प्रकृति से व जैविक शत्रुओं से अपनी रक्षा करने में अक्षम... यह दिमाग ही था, जो वह पूरी दुनिया पर छा गया... और यह भी उतना ही सही है कि पूरी दुनिया पर छा जाने की उसकी कोशिशों के चलते ही उसका दिमाग भी विकसित हुआ... सोचा जाये तो मानव जैविक विकासक्रम की उस शाखा के शिखर पर है जो अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये अपने दिमाग पर निर्भर है... एक कपि का चार पैरों से चलना छोड़ दो पैरों पर खड़ा होना... अगले दो पैरों का हाथ बन बारीक कामों के लिये मुक्त होना... हाथों के अंगूठे का उंगलियों से ९० डिग्री के कोण पर आ जाना ताकि चीजों पर बेहतर पकड़ और पकड़ी चीजों पर बेहतर नियंत्रण हो सके... सामूहिक शिकार व भोजन संग्रह करना... इस काम की आवश्यकताओं के चलते भाषा का विकसित होना... समूह में रहने के कारण नियमों का बनना आदि आदि... मस्तिष्क निश्चित रूप से मनुष्य के ऐतिहासिक विकास की परिस्थितियों की स्वाभाविक उपज है... पर यही बात ईश्वर की अवधारणा के लिये कहना, जो यकीनी तौर पर मानव विकासक्रम में बहुत बाद में आयी... भाषा के विकसित हो जाने के बाद... और अलग अलग मानव समूहों में अलग अलग तरीके से आयी... कितना सही है यह... क्या यह समूहों के नेतृत्व का अपनी नाकामियों के लिये ठीकरा फोड़ने व अपने नेतृत्व को एक लेजिटिमेसी देने के लिये गढ़ा मिथक नहीं था...

यह बात निश्चित हुई कि आप जैव-अजैव जगत के क्रम-विकास की अवधारणाओं से भली-भांति परिचित हैं और उनसे संजीदगी के साथ मुतमइन हैं। ईश्वर की अवधारणा के संदर्भ में आप असहमत हैं और इसके पीछे आपके पास इसके वाज़िब कारण हैं। अपनी बात को हम शनैः शनैः रखेंगे ही, आपके साथ बातचीत को आगे बढ़ाते हुए। असहमति संवाद के लिए एक आवश्यक तत्व है। अपने भावी संवाद की जुंबिशें इसी से तय होंगी। आप असहमतियों को इसी तरह, और सहमति के बीच के संशयों को भी इसी स्पष्टता के साथ रखते रहिए।

इसी संदर्भ में, जैव-अजैव जगत के क्रम-विकास का तो तय हुआ पर हम आपके विचार, जैव जगत से विकसित हुए मानव-समाज के विकास के बारे में भी जानना चाहेंगे। क्या आपको लगता है कि समाज, सामाजिक संगठनों, संस्थाओं, व्यवस्थाओं, आदि का भी क्रमिक विकास हुआ है? क्या ये भी सरल रूप से कठिनतर रूपों की ओर विकसित हुए हैं?

आपने सही कहा है, यह एक तथ्य है ही कि वर्तमान रूप में अस्तित्वमान ईश्वर की अवधारणा निश्चित ही विकास-क्रम में बहुत बाद की चीज़ है। आपने ईश्वर की अवधारणा को अलग-अलग मानव समूहों में अलग-अलग तरीके से आया हुआ कहा है, जो कि इसके विशिष्ट स्वरूपों के संदर्भ में पूरी तरह ग़लत भी नहीं है। पर यदि हम इसके विशिष्ट स्वरूपों यानि कि नामों, संज्ञाओं, विशेष परंपराओं और आस्थाओं को कुछ देर के लिए त्याज्य दें, और फिर इसके सामान्य स्वरूप को देखें, इसका सामान्यीकरण करें तो हमारे पास क्या बचता है? एक अलौकिक शक्ति, परम चेतना, परम आत्मा, जिसने इस ब्रह्मांड़, दुनिया को रचा इसकी सारी विशेषताओं के साथ, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, जिसके कि पास दुनिया के सारी चीज़ों का, उनके व्यवहारों और भाग्यों का, परम नियंत्रण है। जिसे आराधना से खुश किया जाना चाहिए, उसकी कृपा के लिए प्रार्थना में रहना चाहिए। क्या अब यह सामान्यीकृत रूप भी आपको अलग-अलग मानव-समूहों में अलग-अलग ही लगता है? क्या यही रूप कमोबेश रूप से हर समूह और इसके सांस्थानिक रूपों यानि धर्मों में लगभग समान रूप से ही नहीं पाया जाता है?

इस बारे में भी आपसे जानना है कि क्या ईश्वर की अवधारणा अलग-अलग समूहों में लगभग ही स्थिर रही है या इसमें भी परिवर्तन हुए हैं? क्या यह इसी वर्तमान रूप में अस्तित्व में आई और स्थिर हो गई? क्या ऐसा हो सकता है कि किन्हीं और आद्य रूपों से इसका विकास हुआ हो? क्या आज भी उपस्थित कई आदिवासी समूहों में, जनजातियों में ईश्वर की अवधारणाओं के ऐसे ही रूप अस्तित्वमान दिखते हैं? क्या इस बात की जरा सी भी संभावना हो सकती है कि इस अवधारणा का भी क्रमिक-विकास हुआ हो?

आप जरा उपरोक्त सवालों पर थोड़ा सा अपने विचार रखिए। फिर चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

सब के पास एक ही प्रश्न था ये दुनिया कैसे बनी? कैसे चलती है? किस ने बनाई? कौन चलाता है? आप देखेंगे कि पहले दो प्रश्नों में दूसरे दो प्रश्नों से भेद है। पहले दो प्रश्न बिना किसी आरंभिक मान्यता के चलते हैं जब कि दूसरे दो प्रश्न एक मान्यता ले कर चलते हैं कि कोई तो है जिस ने बनाया है और जो चलाता है। बाद के इन दो प्रश्नों में ही उन के उत्तर भी मौजूद थे, काल्पनिक ही सही। सारी दुनिया के अलग अलग मनुष्य समूहों के सामने प्रश्न एक जैसे थे और दुनिया तो सब जगह एक जैसी ही थी सिवाय भोगोलिक भिन्नता के। तो उन के आधारभूत उत्तर भी एक जैसे ही मिलने थे।

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