शनिवार, 28 जून 2014

निषेध के निषेध का नियम का सार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम पर चर्चा करते हुए ‘निषेध के निषेध’ की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘निषेध के निषेध का नियम का सार" प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



निषेध के निषेध का नियम - चौथा भाग
निषेध के निषेध का नियम का सार

अभी तक की विवेचना के आधार पर, अब हम निषेध के निषेध ( negation of the negation ) के द्वंद्वात्मक नियम की प्रमुख प्रस्थापनाओं ( prepositions ) को निरूपित ( formulate ) कर सकते हैं। यह नियम प्रकृति, समाज और चिंतन में विकास की दिशा का निर्धारण ( determines ) करता है।

हेगेल  के कृतित्व से उपजे इस नियम को परंपरानुसार निषेध के निषेध का नियम कहते हैं, किंतु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialist dialectics ) में इसे परस्पर अपवर्जक निषेधों ( mutual exclusive negations ) का एक युग्म ( pair ) नहीं, बल्कि विकास की ऐसी असीम प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें द्वंद्वात्मक निषेध, पुरातन ( old ) से नूतन ( new ) की ओर रास्ते को खोलते हैं और साथ ही पुरातन से नूतन के संबंध ( link ) को तथा उनके बीच सातत्य ( continuity ) को सुनिश्चित बनाते हैं। इस नियम की मुख्य प्रस्थापनाएं साररूप में इस प्रकार हैं:

( १ ) विकास के दौरान ऐसा नूतन लगातार उत्पन्न होता रहता है, जो पहले विद्यमान नहीं था और जो पुरातन का द्वंद्वात्मक निषेध होता है।

( २ ) निषेध के दौरान हर मूल्यवान और जीवंत ( viable ) चीज़ संरक्षित ( preserved ) रहती है और परिवर्तित रूप में नूतन में सम्मिलित ( include ) होती है। पुरातन के केवल उसी अंश का उन्मूलन ( elimination ) होता है, जो गतावधिक ( outlived ) हो गया है और विकास में बाधा डालता है।

( ३ ) विकास में पहले की बीती अवस्थाओं की एक निश्चित वापसी और पुनरावर्तन ( repetition ) होता है, किंतु एक नये और उच्चतर स्तर ( higher level ) पर और इसीलिए उसका स्वरूप वृत्ताकार या रैखिक नही, सर्पिल ( spiral ) होता है।

( ४ ) विकास की प्रक्रिया के दौरान पुराने से नये में संक्रमण ( transition ) के समय वस्तुगत स्वरूप की प्रगतिशील तथा पश्चगामी ( प्रतिगामी ) प्रवृत्तियां ( progressive and regressive tendencies ) होती हैं। सारी घटना का परिवर्तन प्रगतिशील होगा या पश्चगतिक, यह इस बात पर निर्भर होता है कि इन द्वंद्वात्मक्तः संबंधित दो प्रवृत्तियों में से कौनसी प्रभावी ( dominant ) है।

जब हम निषेध के निषेध के नियम की तुलना द्वंद्ववाद के अन्य बुनियादी नियमों ( विरोधियों की एकता और संघर्ष का नियम तथा परिणाम से गुण में रूपांतरण का नियम ) से करते हैं, तो उनको परस्पर जोड़नेवाले गहरे संबंध को आसानी से देखा जा सकता है। ‘अंतर्विरोधों के समाधान’, ‘गुणात्मक छलांग’ तथा ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ जैसे प्रवर्गों ( categories ) के साथ तुलना में यह बात स्पष्टतः सामने आती है। वास्तव में कोई भी गुणात्मक छलांग ( qualitative leap ) सारतः घटना के प्रमुख आंतरिक अंतर्विरोधों ( internal contradictions ) का समाधान ( resolution ) होती है। इसी प्रकार, एक द्वंद्वात्मक निषेध यह बतलाता है कि पुराने गुण से नये में छलांगनुमा ( leap-like ) संक्रमण में संरक्षण या निरंतरता का और साथ ही उन्मूलन और विनाश का एक घटक विद्यमान होता है। इस तरह द्वंद्ववाद के मुख्य नियम विकास के स्रोतों, रूप और दिशा के बारे में पूर्ण ज्ञान प्रदान करते हैं और इसी से उनकी आंतरिक एकता निर्धारित होती है।

प्रकृति, समाज तथा चिंतन के विकास के इन सबसे सामान्य नियमों का विराट व्यावहारिक तथा राजनीतिक महत्त्व भी है। इनमें पारंगता हमें सारी घटनाओं को उनके आंतरिक, पारस्परिक संयोजन तथा उनकी पारस्परिक कारणता में देखना सिखाती है। ये बताते हैं कि व्यावहारिक जीवन में उत्पन्न होनेवाली समस्याओं को अधिभूतवादी ( metaphysical ) ढंग से, अन्य से पृथक ( isolated ) रूप में देखना-समझना एक सही नज़रिया नहीं है। अंतर्संबंधित ( interconnected ) समस्याओं और कार्यों को सतत गति तथा विकास में भी देखना चाहिए, क्योंकि स्वयं जीवन, यानि उन्हें जन्म देनेवाली वास्तविकता भी परिवर्तित और विकसित हो रही है।

द्वंद्ववाद के ये नियम सिखलाते हैं कि हमें जीवन के अंतर्विरोधों को नजरअंदाज़ ( ignore ) नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें खोजना, उनका उद्‍घाटन करना तथा उनके समाधान की प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि आंतरिक, बुनियादी अंतर्विरोधों का समाधान ही किसी भी विकास का असली स्रोत होता है। जब हमारा सामना क्रमिक, कभी-कभी महत्त्वहीन, गुणात्मक परिवर्तनों से होता है, तो हमें इस बात पर लगातार ध्यान देना चाहिए कि वे देर-सवेर आमूल गुणात्मक परिवर्तनों को जन्म दे सकते हैं। साथ ही गुणात्मकतः नयी घटनाओं का उद्‍भव पुरानी घटनाओं के पूर्ण उन्मूलन का द्योतक नहीं होता। पूर्ववर्ती विकास के दौरान रचित हर मूल्यवान और जीवंत चीज़, छलांग और निषेध की प्रक्रिया में संरक्षित रहती है तथा और भी अधिक विकसित होती है। समाज के सही वैज्ञानिक, राजनीतिक नेतृत्व का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह जानना है कि पुरातन में नूतन के बीजों को कैसे देखा जाये, उन्हें समय रहते कैसे समर्थन दिया जाये तथा विकसित होने एवं उचित स्थान पर पहुंचने में कैसे सहायता दी जाये।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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