शनिवार, 9 अगस्त 2014

अंतर्वस्तु और रूप - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अंतर्वस्तु और रूप’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अंतर्वस्तु और रूप - २
( Content and Form ) - 2

अंतर्वस्तु और रूप की एकता, अटूट संबंध और अंतर्क्रिया एक सार्विक नियम है। ऐसी एकता इस तथ्य से उपजती है कि पहले, वे एक दूसरे के बग़ैर अस्तित्व में नहीं रह सकते ; अंतर्वस्तु हमेशा एक रूप में आवृत्त ( covered ) होती है और रूप हमेशा किसी अंतर्वस्तु को आवेष्टित ( involved ) करता है। दूसरे, अंतर्वस्तु का अस्तित्व एक निश्चित रूप में ही हो सकता है : कोई भी ठोस रूप हमेशा एक निश्चित अंतर्वस्तु के तदनुरूप ( corresponding ) होता है।

इसके साथ ही अंतर्वस्तु और रूप की एकता हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय ( unchangeable ) नहीं होती। यह गत्यात्मक ( dynamic ) और द्वंद्वात्मकतः अंतर्विरोधी ( contradictory ) होती है। वस्तुओं में अंतर्वस्तु और रूप हमेशा अपने विकास के विरोधी ( opposite ) पक्षों या तत्वों की शक्ल में प्रकट होते हैं। चूंकि कोई भी वस्तु सार्विक अंतर्क्रिया की स्थिति में होती है, अतः उसकी अंतर्वस्तु में बदलते रहने की प्रवृत्ति ( tendency ) होती है। इसके विपरीत प्रदत्त वस्तु के अस्तित्व का रूप वस्तु के स्वसंरक्षण ( self-preservation ) तथा स्थायित्व ( sustainability ) की प्रवृत्ति को व्यक्त करता है ; संपर्क और संबंध, वह ढंग, जिसके अनुसार रूप के तत्व संगठित हैं, उतनी जल्दी परिवर्तित नहीं हो सकते, जितनी जल्दी अंतर्वस्तु के घटक पहलू और प्रक्रियाएं बदलती हैं।

रूप अंतर्वस्तु के प्रभाव से उत्पन्न व परिवर्तित होता है, जिससे इसके परिवर्तन में अंतर्वस्तु के परिवर्तन से किंचित पीछे रहने का रुझान ( trend ) हो जाता है। अंतर्वस्तु और रूप के संघर्ष का कारण यही है। उनके बीच अंतर्विरोध ( contradiction ) का विकास और समाधान वस्तुओं के विकास का एक मुख्य स्रोत है, उनके रूपों में परिवर्तनों तथा उनकी अंतर्वस्तु के रूपांतरण ( transformation ) का मुख्य कारण है। वस्तुओं में परिवर्तन उनकी अंतर्वस्तु में परिवर्तनों से प्रारंभ होते हैं, जो अंततः उनके रूप के विकास का निर्धारण ( determination ) करते हैं। यही कारण है कि अंतर्वस्तु और रूप की द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) में अंतर्वस्तु निर्णायक भूमिका ( decisive role ) अदा करती है।

वस्तुओं के विभिन्न पक्षों का, अंतर्वस्तु और रूप में विभाजन भी निरपेक्ष ( irrelative, absolute ) नहीं है : वह, जो एक संदर्भ में अंतर्वस्तु है, दूसरे में रूप बनकर प्रकट होता है और इसका विलोम भी सही है। मसलन, यदि हम एक उत्पादन पद्धति को देखें तो उत्पादन के संबंध उसके रूप हैं, जबकि उत्पादक शक्तियां उसकी अंतर्वस्तु हैं। इसके साथ ही ये ही उत्पादन संबंध, किसी भी सामाजिक-आर्थिक विरचना का आधार होते हैं, अतः इस संदर्भ में ये इस विरचना की अंतर्वस्तु के रूप में प्रकट होते हैं। रूप की सापेक्षता ( relativity ) का मतलब यह है कि यद्यपि यह अंततः अंतर्वस्तु से निर्धारित होता है, तथापि इसके विकास के स्वयं अपने ही नियम भी हैं। इसके फलस्वरूप रूप और अंतर्वस्तु का विकास समकालिक ( simultaneous ) नहीं होता और इससे उनके बीच स्वभावतः एक अंतर्विरोध उत्पन्न हो जाता है। विकास के दौरान एक नयी अंतर्वस्तु कुछ समय तक पुराने रूप को धारण किये रह सकती है। इसी तरह एक ही अंतर्वस्तु विभिन्न रूप भी ग्रहण कर सकती है।

रूप और अंतर्वस्तु की द्वंद्वात्मकता की एक और अभिव्यक्ति ( expression ) यह है कि उनके बीच के अंतर्विरोध अनिवार्यतः बिगड़ते हैं और कुछ दशाओं में टकराव ( clash ) की हद तक पहुंच जाता है। उस हद पर आगे और अधिक विकास केवल तभी हो सकता है, जबकि पुराना रूप नये रूप से प्रतिस्थापित ( replaced ) हो ताकि अंतर्वस्तु और रूप के बीच एक नयी संगति ( consistency ) स्थापित हो जाए। इसके बाद यह चक्र नये सिरे से चालू हो जाता है।

संज्ञान ( cognition ) की प्रक्रिया के लिए भी रूप और अंतर्वस्तु की वस्तुगत द्वंद्वात्मकता बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। चूंकि रूप अंतर्वस्तु से संयोजित ( connected ) और उसकी एक अभिव्यक्ति है, इसलिए संज्ञान को रूप के अवबोधन ( perception ) से आरंभ करके अंतर्वस्तु के उद्‍घाटन ( exposition ) की ओर, और फिर वापस सारी वस्तु की तरफ़ जाना चाहिये और उसके बाद एक उच्चतर स्तर पर रूप के अध्ययन पर पहुंचना और यही सिलसिला जारी रखना चाहिये। सच्चा वैज्ञानिक ज्ञान तभी बनता है, जब संज्ञान अंतर्वस्तु को तथा उसके व रूप के बीच वस्तुगत द्वंद्वात्मकता को उद्‍घाटित ( exposed ) करता है। यथा, जैव प्रकृति का संज्ञान वनस्पति व जीवों की बाहरी विशेषताओं के बारे में ज्ञान के संचय ( collection ) तथा जातियों, वंशों, वर्गों में उनके वर्गीकरण ( classification ) से शुरू हुआ और फिर उनकी अंतर्वस्तु को उद्‍घाटित करने, यानी विशिष्ट अंतरों के आनुवंशिक आधार ( genetic basis ) तथा क्रमविकास ( evolution ) के सर्वाधिक सामान्य नियमों का पता लगाने के लिए अग्रसर हुआ।

वस्तु के विकास में इसके विभिन्न पहलुओं और तत्वों की भूमिका को स्पष्ट करना भी महत्त्वपूर्ण है। सार और आभास के प्रवर्ग से हमें इसे समझने में मदद मिलती है, जिसे हम अगली बार प्रस्तुत करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

केवल राम : ने कहा…

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