शनिवार, 2 अगस्त 2014

अंतर्वस्तु और रूप - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘अंतर्वस्तु और रूप’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अंतर्वस्तु और रूप - १
( Content and Form ) - 1

हमारे गिर्द दुनिया सतत गतिमान है। यह गति अनेक रूपों में होती है। हम अक्सर साहित्यिक व कलात्मक रचनाओं में रूप ( form ) और अंतर्वस्तु ( content ) की, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों, सामाजिक प्रतिद्वंद्विता, आदि के रूपों के बारे में चर्चा करते हैं। दैनिक जीवन में हम इन शब्दों के सही-सही वैज्ञानिक अर्थ पर शायद ही कभी विचार करते हैं, लेकिन सैद्धांतिक दार्शनिक मामलों पर विचार करते समय ऐसा करना जरूरी होता है।

रूप और अंतर्वस्तु क्या है? हमारे आसपास की घटनाएं बहुत जटिल हैं, उनके अनगिनत भाग और तत्व होते हैं, जिनके बीच स्थायी संबंध, संयोजन ( connections ) या अंतर्क्रियाएं ( interactions ) होती हैं, जिन्हें संरचनाएं ( structures ) कहा जाता है। किसी भी संरचना का एक बाहरी और एक भीतरी पक्ष होता है। संरचना के बाहरी पक्ष को उसका रूप कहते हैं और भीतरी पक्ष तथा उसके घटक तत्वों व प्रक्रियाओं को उसकी अंतर्वस्तु कहते हैं। अंतर्वस्तु और रूप के प्रवर्ग ( category ) वस्तु या घटना के सार ( essence ) को समझने में सहायक होते हैं। सारी वस्तुओं और घटनाओं की अपनी अंतर्वस्तु और रूप होता है। सारी वस्तुएं वस्तुतः अपने बाहरी पक्ष में एक दूसरे से तथा मनुष्य के साथ अंतर्क्रिया करती हैं, इसलिए उनकी अंतर्वस्तु प्रत्यक्ष प्रकाश में नहीं आती, बल्कि बाहरी पक्ष, यानी रूप की मध्यस्थता से ऐसा करती हैं।

अंतर्वस्तु, उन तत्वों, पहलुओं, प्रक्रियाओं तथा उनके संबंधों का साकल्य है, जो प्रदत्त वस्तु या घटना के अस्तित्व ( existence ) के लिए आधारभूत ( basic ) हैं और जिन पर उनके रूप का विकास और परिवर्तन आश्रित ( dependent ) है। रूप, अंतर्वस्तु के संगठन और अस्तित्व की विधि है, किसी एक प्रदत्त अंतर्वस्तु के तत्वों, पहलुओं और प्रक्रियाओं के बीच ऐसा आंतरिक विशिष्ट संयोजन होता है, जो अंतर्वस्तु को बाह्य दशाओं के साथ अपनी अंतर्क्रिया में एक प्रकार की अखंडता ( integrity ) प्रदान कर देता है।

अंतर्वस्तु तथा रूप किसी वस्तु या घटना के दो अभिन्न पक्ष ( integral aspects ) हैं। विश्व में रूप और अंतर्वस्तु के बिना कुछ नहीं होता है। मसलन, कोई भी जीवित अंगी ( living organism ) तत्वों ( कोशिकाओं, अंगों, हिस्सों ) तथा प्रक्रियाओं ( उपापचयन, उत्परिवर्तन, आदि ) से बना होता है, जो उसकी अंतर्वस्तु की रचना करती हैं। इन तत्वों और प्रक्रियाओं के संगठन व संबंध की जो विधि ( method ) उस अंतर्वस्तु को अपना अस्तित्व रखने में सक्षम बनाती है, वह उसका रूप है। इस तरह, संपूर्ण जैव प्रकृति, रूप और अंतर्वस्तु के तादात्म्य या अविभाज्यता का एक सतत प्रमाण है।

सारी सामाजिक प्रक्रियाओं और घटनाओं में अंतर्वस्तु और रूप की एक आंगिक एकता ( organic unity ) भी होती है। मसलन, उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) किसी भी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) की अंतर्वस्तु हैं और उत्पादन संबंध ( relations of production ) उसका रूप हैं। साहित्य और कला की कृतियों में कलात्मक बिंबों के रूप में परावर्तित जीवन ( reflected life ) उनकी अंतर्वस्तु है और इन बिंबों को संगठित और व्यक्त करने की पद्धति उनका रूप हैं। इस तरह, भाषा, संरचना, शैली, आदि साहित्यिक कृति का रूप हैं।

किन्हीं भी वस्तुओं और प्रक्रियाओं की अंतर्वस्तु का एक बाहरी और एक भीतरी रूप होता है। वस्तुओं का बाहरी रूप उनका आयतन, आकृति, रंग आदि है और भीतरी रूप उसकी अंतर्वस्तु का संगठन है। बाहरी रूप अंतर्वस्तु के साथ उतनी घनिष्ठता से नहीं जुड़ा होता, जितना की भीतरी रूप। अंतर्वस्तु में कोई भी परिवर्तन किये बग़ैर उस रूप में उल्लेखनीय परिवर्तन किये जा सकते हैं। मसलन, किसी भी महत्त्वपूर्ण पुस्तक को विभिन्न आकार-प्रकारों वाले चार या दस खंडों में छापा जा सकता है, भिन्न-भिन्न गुणवत्ता वाले काग़ज़ पर मुद्रित ( print ) किया जा सकता है, भिन्न-भिन्न तरीक़ों से रूपांतरित किया जा सकता है, आदि-आदि। लेकिन कुछ मामलों में, जैसे विमान या जहाज निर्माण में, अंतर्वस्तु पर काफ़ी अधिक प्रभाव डाले बिना बाहरी रूप में मनमाने परिवर्तन नहीं किये जा सकते। यहां बाहरी रूप तकनीकी दृष्टि से इतना समुपयुक्त ( suitable ) है कि वह अंतर्वस्तु से प्रत्यक्षतः संयोजित ( direct connected ) हैं।

आंतरिक रूप, अंतर्वस्तु से और भी अधिक घनिष्ठता ( closeness ) से जुड़ा होता है। उसमें होनेवाले कोई भी परिवर्तन किसी न किसी तरह से अंतर्वस्तु में परावर्तित होते ही हैं। मसलन, शैली या संरचना में परिवर्तन कथानक को, साहित्यिक रचना की अंतर्वस्तु को अवश्य ही प्रभावित करता है, उससे रचना का भावनात्मक प्रभाव ( emotional impact ) निश्चय ही भिन्न हो जाता है। कला में अंतर्वस्तु और रूप की एकता, उसका एक प्रमुख नियम तथा जीवंतता का स्रोत है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

BLOGPRAHARI ने कहा…

आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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Neetu Singhal ने कहा…

जिस प्रकार मुख्य आवरण एवं पत्र सयोजन किसी पुस्तक का रूप है अंतर्लेख उसकी अंतर्वस्तु है एवं भाव अंतरतम वस्तु है, जो शरीर ह्रदय एवं आत्मा के सदृश्य है.....

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