शनिवार, 8 नवंबर 2014

संज्ञान का द्वंद्वात्मक सिद्धांत

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘संभावना और वास्तविकता’ के प्रवर्गों पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान का द्वंद्वात्मक सिद्धांत
( dialectical theory of knowledge )

द्वंद्ववाद के प्रवर्गों ( categories of dialectics ) की विवेचना के बाद अब हम भौतिकवादी द्वंद्ववाद के अंतर्गत संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत ( dialectical theory of knowledge ) के व्यवस्थित निरूपण ( systematic representation ) की ओर आगे बढ़ेंगे। जैसा कि हम पहले भी यहां चर्चा कर चुके हैं, संज्ञान की समस्या दर्शनशास्त्र के मूलभूत प्रश्न के दूसरे पहलू ( second aspect ) को प्रतिबिंबित करती है। यह पहलू इस प्रकार है : क्या चेतना ( consciousness ) इस विश्व का सही प्रतिबिंबन कर सकती है, क्या मनुष्य प्रकृति तथा समाज के नियमों और बाह्य परिवेश के मूलभूत गुणों तथा सहसंबंधों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है और यदि हां, तो यह कितना पूर्ण है? इस प्रश्न का उत्तर देनेवाले मतों और दृष्टिकोणों को संज्ञान का सिद्धांत ( theory of knowledge ) या ज्ञानमीमांसा ( epistemology ) कहा जाता है।

मनुष्य अपने जीवन के हर क्षण पर अपने परिवेशीय जगत के बारे में कुछ न कुछ जानने का, उसके रहस्यों को खोलने के प्रयत्नों में जुटा रहता है। इन्हीं प्रयत्नों में मानवजाति ने परिवेशी विश्व के बारे में उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ ज्ञान हासिल किया और उसे संचित करती रही। आधुनिक मनुष्य विस्तृत ज्ञान का धनी है और अत्यंत विविधतापूर्ण कौशलों का स्वामी है। कुछ लोग स्वचालित मशीनों को चलाना जानते हैं, अन्य अंतरिक्ष यान बनाना तथा उनमें उड़ना जानते हैं। कुछ अन्य परमाणु नाभिक को विखंडित करना और उसकी ऊर्जा को उपयोग में लाना जानते हैं। पिछली सदियों के सापेक्ष हमारा ज्ञान कई गुना बढ़ गया है, केवल प्रकाशित पुस्तकों की संख्या तथा वैज्ञानिक पत्रिकाओं के लेखों से ही यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

हर कोई अच्छी तरह से जानता है कि ज्ञान, विशेषतः वैज्ञानिक ज्ञान, उद्योगों ( industry ) का एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक बल ( motive force ) है। केवल उसी के आधार पर प्रकृति तथा समाज के बीच तीक्ष्ण अंतर्विरोधों ( acute contradictions ) का उन्मूलन ( elimination ) हो सकता है और स्वयं समाज को तर्कबुद्धिसम्मत ( rationally ) ढंग से रूपांतरित ( transformed ) किया जा सकता है तथा मानव जीवन को अधिक दिलचस्प, स्वस्थ और बुद्धिमतापूर्ण ( intelligent ) बनाया जा सकता है। लेकिन यह कहना सबके वश की बात अक्सर ही नहीं होती है कि ज्ञान क्या है, कैसे उत्पन्न होता है, इसके स्रोत ( source ) कहां हैं और सत्य ज्ञान को मिथ्या ( false ) और असत्य ज्ञान से किस प्रकार विभेदित ( distinguish ) किया जाये और क्या हमारे पास इस बात की कोई गारंटी है कि हम सामान्यतः स्वयं को तथा अपने परिवेशीय जगत को जान सकें।

हममें से हर कोई बहुत सी तरह-तरह की वस्तुओं को जानता है और ऐसी बहुविध जानकारियां रखता है, जिनकी सत्यता में कोई संदेह नहीं करता। हम जानते हैं कि बिजली का लैंप कैसे जलाया जाता है, धातु का टुकड़ा कैसे जोड़ा जाता है, गमले में एक पौधे के लिए हमें क्या करना होगा या टेलीफ़ोन डायरेक्टरी में ज़रूरी नंबर कैसे खोजा जाता है। जीवन के अनुभव ( experience ) की कसौटी पर खरी उतरी ये जानकारियां मानो हमारे ज्ञान की सत्यता में हर तरह के संदेह को मिटा देती हैं।

किंतु प्रायः ऐसा भी होता है कि पहली नज़र में निर्विवाद प्रतीत होनेवाली बात ग़लत निकलती है। उदाहरण के लिए, पांच-छह सौ वर्ष पूर्व लोगों का विश्वास था कि पृथ्वी चपटी है तथा विश्व का केंद्र है और ग्रह और सूर्य उसके चारों ओर चक्कर काटते हैं। अब अधिकतर लोग जानते हैं कि पृथ्वी लगभग गोलाकार है तथा अन्य ग्रह सूर्य के गिर्द चक्कर लगाते हैं। लेकिन हमारे दैनिक प्रेक्षण ( observation ) अब भी हमें बतलाते हैं कि सूर्य पूर्व में उदय होता है और पश्चिम में अस्त होता है। १९वीं सदी के अंतिम वर्षों तक वैज्ञानिकों का विश्वास था कि परमाणु, पदार्थ के लघुतम कण, अविभाज्य हैं। पर अब हम जानते हैं कि यह धारणाएं भी असत्य हैं, मूल कणों की भी एक आंतरिक संरचना होती है। चंद्रमा तक मनुष्य की उड़ान से पहले कई वैज्ञानिकों का विचार था कि चंद्रमा पृथ्वी से टूटा हुआ एक टुकड़ा है, जो पृथ्वी के तप्त गोले से उस समय टूटा, जब कोई विशाल आकाशीय पिंड उसके क़रीब से होकर गुजरा था। चंद्रमा से प्राप्त आधार-सामग्री से पता चला है कि पुरानी प्राक्कल्पनाएं ( hypothesis ) असंतोषजनक हैं और चंद्रमा की उत्पत्ति की सही जानकारी के लिए और अधिक खोजबीन करने की ज़रूरत है।

इस तरह के तथ्यों से जुड़ी बातें हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि क्या हमारी सभी जानकारियां वस्तुतः सत्य, निर्विवाद हैं? क्या कोई सुदृढ़, विश्वसनीय ज्ञान है? आज हम सोचते हैं कि हम किसी घटना के बारे में हम सब कुछ जानते हैं, लेकिन कल ही यह साबित हो सकता है ( जैसा कि अतीतकाल में अनेक बार हुआ है ) कि हमारा ज्ञान त्रुटिपूर्ण था। क्या विश्व का संज्ञान प्राप्त करने का कोई विश्वसनीय तरीक़ा है, जो हमें भ्रांतियों ( fallaciousness ) से बचा सके? क्या हमारा चिंतन ( thought ) बाह्य जगत का सही-सही संज्ञान ( cognition ) कर सकता है, क्या हम अपने आसपास की घटनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में सही अंदाज़ा लगा सकते हैं और कि क्या हम अपने निर्णयों ( judgments ) तथा कथनों ( statements ) के आधार पर सफलता पूर्वक कर्म ( act ) कर सकते हैं? इस तरह से यह प्रश्न कि क्या विश्व संज्ञेय ( knowable ) है और अगर ऐसा है, तो किस सीमा तक तथा क्या मनुष्य बिल्कुल सही या लगभग सही ढंग से परिवेशी यथार्थता ( reality ) का संज्ञान प्राप्त कर सकता है, उसे समझ तथा उसकी छानबीन ( investigate ) कर सकता है?, दर्शन के बुनियादी सवाल के दूसरे पक्ष को सामने लाती है, जिसकी चर्चा हमने शुरुआत में की थी।

दार्शनिकों के बीच ऐसे संशय प्राचीन काल में ही पैदा हो गये थे। यदि कुछ दार्शनिकों का दृढविश्वास था कि विश्व संज्ञेय है, अर्थात उसे जाना जा सकता है, और हमारा ज्ञान परिवेशी वस्तुओं, घटनाओं, आदि की सही जानकारी देता है, तो वहीं कुछ दार्शनिकों का कहना था कि विश्व असंज्ञेय ( unknowable ) है, क्योंकि वस्तुएं हमारे उन्हें जानने से पहले ही बदल जाती है। इस प्रकार दर्शनशास्त्र के इतिहास में हम विश्व की संज्ञेयता के पक्ष में भी तर्क पाते हैं और विपक्ष में भी। अतः प्रश्न इसका नहीं है बिना सोचे-समझे तथ्यों को एकत्र किया जाये, अपितु इसका है कि संज्ञान की प्रक्रिया के सार ( essence ) का विश्लेषण ( analysis ) किया जाये और उसकी मुख्य विशेषताओं और नियमसंगतियों को उद्घाटित किया जाये। क्योंकि यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि विश्व की ज्ञेयता और हमारे ज्ञान की सटीकता को परखने का प्रश्न आज के युग में बहुत महत्त्वपूर्ण है। अपनी स्थिति के सही होने पर पूर्ण विश्वास करने के लिए हमें पक्का यक़ीन होना चाहिए कि हम दुनिया को जान सकते हैं और कि हमारा विश्व-दृष्टिकोण ( outlook on the world ) और वैचारिकी ( ideology ) विश्व का सही दृश्य ( correct view ) तथा उसमें होनेवाली घटनाओं का सही मूल्यांकन पेश करते हैं।

विश्व की ज्ञेयता के प्रश्न पर विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों ( philosophical systems ) की विभिन्न रायें हैं और उसका समाधान भी वे भिन्न-भिन्न सुझाती है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की ज्ञानमीमांसा को भली-भांति समझने के लिए पहले दत्त प्रश्न पर उसकी पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के मतों की थोड़ी-बहुत जानकारी होना आवश्यक है, क्योंकि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद इन्हीं विभिन्न सिद्धांतों की समालोचनात्मक ( critical ) समझ का नतीजा है, जिनकी कमियां और कमजोर पक्ष विज्ञान, तकनीक और मानव कार्यकलाप के अन्य रूपों की उन्नति ( advancement ) की बदौलत ऐतिहासिक विकास के दौरान प्रकट हुए थे। साथ ही इस बात पर भी बल दिया जाना चाहिए कि पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों ने संज्ञान की प्रकृति ( nature ), मूलों ( roots ) और कसौटियों के प्रश्न पर जो कुछ भी मूल्यवान तथ्य संग्रहित किये थे, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ने उन्हें अपने में समाहित किया है।

अतएव द्वंद्ववाद के संज्ञान सिद्धांत के व्यवस्थित निरूपण से पहले, हम अगली बार से ऐसे ही विभिन्न मतों की संक्षिप्त जानकारी और उनकी समालोचना प्रस्तुत करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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