शनिवार, 29 नवंबर 2014

अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी संक्षिप्त विवेचना का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा - २
( epistemology of agnosticism - 2 )

हर व्यक्ति और समस्त मानवजाति के जीवन का अनुभव बताता है कि अनुभूतियां ( feelings ) वास्तव में बाह्य विश्व के बारे में हमारे ज्ञान का स्रोत हैं। हम अपने दैनंदिन जीवन में प्रकृति संबंधी प्रयोगों के द्वारा जो अधिकांश ज्ञान पाते हैं, वह इंद्रियबोधों ( senses ) और अनुभूतियों पर ही आधारित होता है। इस प्रश्न पर भौतिकवादी और अज्ञेयवादी दोनों सहमत हैं। उनके बीच का मतभेद तब शुरू होता है, जब संज्ञान की प्रक्रिया में अनुभूतियों की भूमिका ( role ) और उनके स्रोत ( source ) का सवाल उठता है।

भौतिकवादी कहते हैं कि अनुभूतियां मानव मस्तिष्क में बाह्य परिवेश से पहुंचनेवाली सूचना का संप्रेषण ( communication ) तथा प्रसंस्करण ( processing ) करती हैं। इसके विपरीत अज्ञेयवादी भौतिक विश्व के अस्तित्व को और इस तरह संज्ञान की संभावना को भी नहीं मानते। किंतु बात इतनी ही नहीं है। समस्त संज्ञान को इन्द्रियजन्य अवबोध मात्र मानने के बाद अज्ञेयवादी आगे यह नहीं बता पाते कि मनुष्य की चेतना और विशेषतः वैज्ञानिक जानकारियों की प्रणाली में वे विचार या संप्रत्यय ( concepts ) कैसे प्रकट होते हैं, जिन्हें इंद्रियजन्य बिंब ( image ) और अनुभूतियां नहीं कहा जा सकता।

एक स्वतंत्र विचार प्रणाली के रूप में अज्ञेयवाद का जन्म प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञान और गणित के तीव्र विकास के काल में हुआ था। यह गणितीय विश्लेषण, उच्च बीजगणित, इत्यादि के उत्कर्ष का काल था। ये विज्ञान ऐसे संप्रत्ययों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे ‘अनन्तता’, ‘फलन’, ‘अनन्त रूप से लघु परिणाम’, ‘बहुविम सदिश’, आदि। इन सब संप्रत्ययों की रचना केवल अनुभूतियों के आधार पर नहीं की जा सकती और न उन्हें अनुभूति का समतुल्य ( equivalent ) ही कहा जा सकता है। दूसरी ओर, विज्ञान का सारा इतिहास उनके महत्त्व की पुष्टि कर चुका है और वे सिद्धांत के विकास के लिए ही नहीं, अपितु व्यावहारिक परिणाम पाने के लिए भी अत्यावश्यक सिद्ध हुए हैं। यह तथ्य अज्ञेयवाद की अयुक्तिसंगतता को साफ़-साफ़ दिखा देता है, क्योंकि यह आधुनिक विज्ञान के अनेक महत्त्वपूर्ण संप्रत्ययों के मूल और भूमिका को नहीं समझा सकता।

आज के समय में, अज्ञेयवाद की सर्वाधिक अतिवादी और स्पष्ट अभिव्यक्ति अतर्कबुद्धिवाद ( irrationalism ) है। यह विश्वास तथा सहजबोध को, मानव ज्ञान के मुक़ाबले में खड़ा करके मनुष्य की संभावनाओं को सीमित करता है। इसके अनुसार संज्ञान में विवेक, चिंतन और तर्क की शक्ति सीमित होती है, कि संज्ञान की मुख्य विधि अन्तःप्रज्ञा ( intuition ), अनुभूति, सहजवृत्ति ( instinct ), आदि हैं। वे विश्व की एक अराजक, नियमसंगति से रहित, तर्कहीन, संयोग के करतबों वाली निराशावादी तस्वीर पेश करते हैं, और विज्ञान तथा सामाजिक प्रगति का निषेध करते हैं। कुछ अतर्कबुद्धिवादी दार्शनिक, बल तथा संकल्पशक्ति का विचार भी प्रतिपादित करते हैं, जो कि अंततः अपनी नियति में फ़ासिज़्म ( fascism ) की वैचारिकी तथा व्यवहार के निरूपणार्थ एक स्रोत के रूप में काम करता है।

इस तरह अज्ञेयवादी केवल विज्ञान की बुनियाद को ही कमज़ोर नहीं बनाते, बल्कि वैज्ञानिक विश्व-दृष्टिकोण तथा प्रगतिशील वैचारिकी को भी कमज़ोर करते हैं। अतः यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वर्तमान में भी प्रगतिशील वर्गों के विरोधी, वैचारिक संघर्ष में अज्ञेयवाद को एक हथियार की तरह से इस्तेमाल करते हैं। वे यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि विश्व और मनुष्य को जानना असंभव है। वे विज्ञान की भूमिका को सीमित करते हैं, तार्किक चिंतन को अस्वीकार करते हैं तथा प्रकृति और विशेष रूप से समाज के वस्तुगत नियमों के संज्ञान के अस्वीकरण के आधार पर एक वैचारिक घटाघोप की अंधगली में भटकते रहने के लिए हमें छोड़ देते हैं। विश्व की ज्ञेयता ( knowability ) को अस्वीकार करके अज्ञेयवादी हमें इस विश्व में सही दिशा की ओर जाने से वंचित करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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