रविवार, 1 फ़रवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना -३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा आगे बढ़ायी थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना -३
( structure of cognitive process -3 )

अब हम द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के संज्ञान सिद्धांत ( theory of knowledge ) और पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के संज्ञान सिद्धांतों के मुख्य अंतर को निरूपित कर सकते हैं।  ये पूर्ववर्ती प्रणालियां भौतिकवादी या प्रत्ययवादी, कैसी भी क्यों नहीं रही हों, वे सब संज्ञान की प्रक्रिया को दो ही तत्वों से बनी मानती थीं - संज्ञान की वस्तुएं और मनुष्य द्वारा प्राप्त ज्ञान। वस्तु-औज़ार कार्यकलाप या संज्ञेय ( knowable ) परिघटनाओं के साथ मनुष्य की सक्रिय अन्योन्यक्रिया ( active mutual interaction ) की ओर उनकी दृष्टि गयी ही नहीं। इसलिए जब भी इस प्रश्न की चर्चा चली कि मनुष्य विश्व का संज्ञान कर सकता है या नहीं और कैसे, तो भौतिकवादी भी और प्रत्ययवादी भी उस कारगर विधि ( effective method ) को नहीं बता सके, जिसकी सहायता से उनके द्वारा ही प्रस्तावित हल की पुष्टि हो सकती। दूसरे शब्दों में, पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के पास वह मापदण्ड या कसौटी ( criterion ) नहीं थी, जिससे इस या उस दार्शनिक दृष्टिकोण की वस्तुपरक मूल्यवत्ता ( objective valuation ) को आंका जा सकता।

सभी पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के विपरीत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ने एक नयी ही चीज़ को संज्ञान सिद्धांत का केन्द्रबिंदु बनाया और विश्व की संज्ञेयता के भौतिक आधार तथा वस्तुपरक कसौटी के प्रश्न को प्रमुखता प्रदान की। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का संज्ञान सिद्धांत अज्ञेयवादियों और काण्ट के अनुयायियों के संज्ञान सिद्धांतों से इस अर्थ में भिन्न था कि उसने विश्व की संज्ञेयता के प्रश्न का न केवल सकारात्मक उत्तर दिया, अपितु उसे - और यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है - दूसरा, नया आयाम भी प्रदान किया। इस चर्चा में फंसे रहने के बजाय कि हमारी अनुभूतियां ( sensations ), कल्पनाएं और संप्रत्यय ( concept ) उनके मुक़ाबले में खड़े वस्तु-निजरूपों ( the thing itself ) के कितने अनुरूप ( relevant ) हैं, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद अपना ध्यान इसके अध्ययन पर संकेन्द्रित करता है कि ये अनुभूतियां , कल्पनाएं और संप्रत्यय कैसे पैदा होते हैं और उनमें निहित ज्ञान मनुष्य को परिवेशी विश्व में कार्य करने, सही रूख अपनाने और ऐतिहासिकतः उत्पन्न कार्यभारों के अनुसार उसे ( परिवेशी विश्व को ) रूपांतरित ( transform ) करने में किस तरह सहायता देता है।

चन्द्रमा पर स्वचालित स्टेशनों की सहज उतराई और पृथ्वी पर वापसी, दूरस्थ नियंत्रित स्वचालित रॉबोटों की चन्द्रतल पर कई किलोमीटरों की यात्रा और अंतरिक्षयांत्रियों की उतराई और सफल वापसी इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि हमने चन्द्र धरातल की संरचना की विशेषताओं को सचमुच काफ़ी कुछ जान लिया है। ख़मीर की फफूंद के जीन का १९७० में किया गया सफल संश्लेषण ( synthesis ) इसकी पुष्टि करता है कि जीव अवयवियों की आनुवंशिकता ( heredity ) के भौतिक वाहकों की भौतिकीय तथा रासायनिक संरचना के बारे में हमारा ज्ञान सही है।

इस प्रकार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के संज्ञान सिद्धांत के मूलाधार को यों सूत्रबद्ध किया जा सकता है : बाह्य विश्व के संज्ञान का आधार मनुष्य द्वारा श्रम के औज़ारों, यंत्रों, उपकरणों, आदि की मदद से किया जानेवाला वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप ( activity ) है। इस कार्यकलाप में शामिल की गयी वस्तुओं के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गुणों का ज्ञान सही और विश्वसनीय तभी माना जा सकता है, जब उनकी सहायता से हम किन्हीं भौतिक वस्तुओं की रचना, निर्माण या पुनर्निर्माण कर सकें और कोई उचित परिवर्तन ला सकें।

वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप का दूसरा नाम व्यवहार ( practice ) है। अगली बार हम समझने की कोशिश करेंगे कि उसकी विशेषताएं, ढांचा और भूमिका क्या है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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