रविवार, 10 मई 2015

सत्य क्या है - ३ ( वस्तुगत सत्य )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे एवं वस्तुगत सत्य को समझेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ३ ( वस्तुगत सत्य )
what is truth - 3 ( objective truth )

आधुनिक विज्ञान जो जानकारियां हासिल कर चुका है, उनमें से अधिसंख्य ऐसी हैं कि उनका स्वरूप न केवल अध्ययन की जानेवाली वस्तु ( object ) पर, अपितु उन औज़ारों, यंत्रों और उपकरणों पर भी निर्भर होता है, जिनके माध्यम से अनुसंधानकर्ता और वस्तु के बीच अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) होती है। संज्ञान ( cognition ) के इन सभी साधनों का यथार्थ अस्तित्व ( real existence ) है, किंतु उसकी रचना लोगों के द्वारा की जाती है और इसलिए कुछ हद तक वे आत्मगत कारक ( subjective factors ) पर निर्भर होते हैं। दूसरे शब्दों में, जिन संकल्पनाओं ( concepts ), कथनों ( statements ) और अनुमानों ( inference ) के द्वारा हम हम बाह्य जगत के, और स्वयं अपने बारे में ज्ञान को व्यक्त करते हैं, वे इस जगत का ही परावर्तन ( reflection ) नहीं, बल्कि हमारे क्रियाकलाप ( activity ) का उत्पाद ( product ) भी हैं।

फलतः, ज्ञान में कुछ ऐसी चीज़ है, जो उस पर काम करनेवाले व्यक्ति पर निर्भर होती है, यानी संज्ञान के विषयी ( subject ) पर। विज्ञान का लक्ष्य यही है कि हमारे ज्ञान में उन तत्वों का अनुपात निरंतर बढ़ता जाये, जो अध्ययनाधीन वस्तुओं की नियमसंगतियों, गुणों और संबधों को प्रतिबिंबित करते हैं और जो किसी व्यक्ति या मानवजाति पर निर्भर नहीं होते। अतएव कहा जा सकता है कि जहां तक हमारा ज्ञान वस्तुगत जगत ( objective world ) को परावर्तित करता है, उसमें एक ऐसी अंतर्वस्तु ( content ) भी होती है, जो न तो मनुष्य पर निर्भर है, न ही सारी मानवजाति पर और फलतः केवल वस्तुगत जगत पर ही निर्भर होती है। हमारे विचारों और ज्ञान की इस अंतर्वस्तु को, जो न तो एक अलग व्यक्ति पर निर्भर होती है, न ही सारी मानवजाति पर, वस्तुगत सत्य ( objective truth ) कहते हैं

यह कथन कि सामान्य दाब पर, १०० डिग्री सेल्सियस तापमान तक गर्म करने पर पानी भाप में परिणत हो जाता है, एक वस्तुगत सत्य है। हालंकि यह तथ्य कि हम इस तापमान को फ़ारेनहाइट या रियोमूर थर्मामीटर से, या सेल्सियस से नापते हैं, मनुष्य पर निर्भर करता है, किंतु इस विशिष्ट तापमान पर स्वयं पानी का उबलना और भाप में तब्दील होना न मनुष्य पर निर्भर है न मानवजाति पर।

सत्य ज्ञान, स्वयं वस्तुगत जगत की भांति ही द्वंद्ववाद ( dialectics ) के नियमों के अनुसार विकसित होता है। मध्ययुग में लोग यह समझते थे कि सूर्य और ग्रह, पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। वह बात सत्य थी या असत्य ? मनुष्य आकाशीय पिंडों की गति को एक ही ‘प्रेक्षण स्थल’, यानी पृथ्वी से देखता था ; इस तथ्य ने उसे इस असत्य निष्कर्ष पर पहुंचाया कि सूर्य और ग्रह, पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। इसमें संज्ञान के विषयी पर हमारे ज्ञान की निर्भरता को देखा जा सकता है, किंतु इस कथन में एक ऐसी अंतर्वस्तु थी, जो मनुष्य या मानवजाति पर निर्भर नहीं थी, वह यह तथ्य कि सौर मंडल के आकाशीय पिंड घूमते तो हैं। उस तथ्य में वस्तुगत सत्य का बीज था।

कोपेर्निकस के सिद्धांत ने इस बात की पुष्टि की कि सूर्य हमारे ग्रहमंडल का केन्द्र है और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह एककेंद्रिक वृत्तों में उसके गिर्द चक्कर काटते हैं। इस सिद्धांत में वस्तुगत अंतर्वस्तु का अंश, पूर्ववर्ती दॄष्टिकोणों की तुलना में बहुत अधिक था, लेकिन वस्तुगत यथार्थता के पूर्णतः अनुरूप क़तई नहीं था, क्योंकि इसके लिए आवश्यक खगोलीय प्रेक्षणों का अभाव था। अपने गुरू टाइको ब्राहे के प्रेक्षणों पर भरोसा करते हुए केपलर ने यह साबित किया कि ग्रह सूर्य के चारों तरफ़ वृत्तों में नहीं, बल्कि दीर्घ वृत्तों ( ellipses ) में चक्कर काटते हैं। यह पहले से कहीं अधिक सत्य ज्ञान था। आधुनिक खगोलविद्या ( astronomy ) में ग्रहों के प्रक्षेप पथों तथा घूर्णन के नियमों की गणना और भी अधिक सटीकता से की गयी है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुगत सत्य इतिहासानुसार विकसित होता है। हर नयी खोज के बाद यह पूर्णतर होता जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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