शनिवार, 23 मई 2015

सत्य क्या है - ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता )
what is truth - 5 ( dialectics of truth )

कोई एक घटना जितनी ज़्यादा जटिल ( complicated ) होती है, निरपेक्ष सत्य की, यानी उसके बारे में पूर्ण ज्ञान की, प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। किंतु इसके बावजूद निरपेक्ष सत्य ( absolute truth ) होता है और उसे मानव ज्ञान की वांछित सीमा और लक्ष्य के रूप में समझना चाहिए। प्रत्येक सापेक्ष सत्य ( relative truth ) हमें उस लक्ष्य के निकटतर लानेवाला एक क़दम है।

पूछा जा सकता है कि इन या उन वस्तुओं के बारे में पूर्ण और सर्वांगीण ( exhaustive ) जानकारी पा लेने के बाद क्या यह प्रक्रिया ख़त्म हो सकती है? यदि हम यह याद रखें कि भौतिक विश्व की बात तो दूर, उसके अलग-अलग खण्ड तक असंख्य गुणों, संबंधों और संपर्कों की समग्रता ( totality ) हैं, तो स्पष्ट हो जायेगा कि किसी भी परिघटना ( phenomena ) का पूर्ण, अंतिम और सर्वांगीण ज्ञान नहीं पाया जा सकता है। यह इसलिए भी संभव नहीं है कि परिवेशी परिघटनाएं स्वयं भी बढ़ती और बदलती रहती हैं और इस प्रक्रिया में उनमें नये गुण, नयी विशेषताएं और नये संबंध प्रकट होते रहते हैं। हम जीव अवयवियों को लें, जो अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) करनेवाली अरबों कोशिकाओं से बने होते हैं, या आर्थिक प्रणालियों को , जिनकी परिधि में हज़ारों उद्यम, करोड़ों कामगार, तरह-तरह के माल बनानेवाले लाखों तरह के यंत्र और उपकरण आते हैं, वे सब इतने जटिल ( complex ) हैं कि ऐसी किसी भी परिघटना या वस्तु के बारे में पूर्ण और निःशेष ( thorough ) ज्ञान प्राप्त करना सर्वथा असंभव है।

पूर्ण, निःशेष ज्ञान, जिसे निरपेक्ष सत्य कहते हैं, तभी पाया जा सकता है, जब परिघटना अत्यंत सामान्य हो और उसमें अपेक्षाकृत थोड़े ही तत्व तथा संबंध हों। ऐसी परिघटनाएं कभी-कभी, उदाहरण के लिए, गणित में मिलती हैं, किंतु यहां भी किसी जानकारी को निरपेक्ष सत्य घोषित कर सकने के लिए अत्यधिक अमूर्तन ( abstraction ) और परिसीमन ( limitation ) की ज़रूरत पड़ती है।

शंकाएं उठायी जा सकती हैं : क्या निःशेष सत्य की अलभ्यता ( unattainability ) को स्वीकार करने का अर्थ उसकी वस्तुगतता का निषेध ( negation ) नहीं है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि विश्व की संज्ञेयता से इंकार करनेवाले अज्ञेयवादी ( agnostic ) सही थे? ऐसी शंकाओं को युक्तिसंगत ( rational ) शायद ही कहा जा सकता है। यदि संज्ञान को द्वंद्वात्मक ( dialectical ) ढंग से समझा जाये और यह माना जाये कि बाह्य विश्व विषयक हमारा ज्ञान, अनिवार्यतः परिणति पर पहुंचने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरन्तर बढ़नेवाली प्रक्रिया है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि विश्व संज्ञेय ( knowable ) है और वह भी इस अर्थ में नहीं कि हम एक ही बार में और सदा के लिए उसका संज्ञान कर सकते हैं, बल्कि इस अर्थ में कि हम ज्ञात सापेक्ष सत्यों को व्यावहारिक कार्यकलाप की सहायता से जांचते और सुधारते हुए निरन्तर बढ़ाते और व्यापक बनाते जा सकते हैं।

यह दावा करना ग़लत है कि सत्य के तीन प्रकार है, अर्थात वस्तुगत, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य। वास्तव में, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य, वस्तुगत सत्य ( objective truth ) के ही विभिन्न स्तर या रूप ( forms ) हैं। हमारा ज्ञान हमेशा सापेक्ष होता है, क्योंकि यह समाज, प्रविधि ( technique ), विज्ञान की अवस्था, आदि के विकास के स्तर पर निर्भर होता है। हमारे ज्ञान का स्तर जितना ऊंचा होता है, हम निरपेक्ष सत्य के उतने ही निकट होते हैं।

फलतः ज्ञान के क्रमविकास का नियम सापेक्ष से निरपेक्ष की ओर उसकी प्रगति ( progress ) का ही नियम है। किंतु यह प्रक्रिया अंतहीन हो सकती है, क्योंकि हम ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था पर अपने परिवेशीय जगत में नये पहलुओं ( aspects ) तथा अनुगुणों ( properties ) की खोज करते हैं और उसके बारे में पूर्णतर तथा अधिक सटीक ज्ञान की रचना करते हैं। सत्य के एक सापेक्ष रूप से दूसरे सापेक्ष रूप में प्रविष्ट होने की यह सतत ( continuous ) प्रक्रिया, संज्ञान की प्रक्रिया में द्वंद्ववाद ( dialectics ) की सबसे महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। इस तरह, प्रत्येक सापेक्ष सत्य में निरपेक्ष सत्य का एक अंश होता है। इसके विपरीत, निरपेक्ष सत्य, सापेक्ष सत्यों के एक असीम अनुक्रम ( succession ) की सीमा है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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