रविवार, 24 जून 2018

कलात्मक चेतना और कला - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में धर्म पर चर्चा की थी, इस बार हम कलात्मक चेतना और कला को समझने की कोशिश शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - १
( Artistic Consciousness and Art - 1 )

कला, मानव क्रियाकलाप का एक सबसे पुराना और सर्वाधिक सार्विक (universal) रूप है। `कला' (art) पद केवल क्रिया का ही नहीं, बल्कि उसके परिणाम का, अर्थात कलाकृति का द्योतक भी है। कला क्या है? समाज के, और अलग-अलग लोगों के जीवन में कला की भूमिका (role) क्या है?

लोग अपने दैनिक उत्पादक क्रियाकलाप (production activity) में अपनी भौतिक आवश्यकताओं (material wants) की पूर्ति के लिए ही वस्तुओं का ( भोजन मकान आदि ) ही निर्माण नहीं करते, बल्कि उन्हें जितना संभव हो, उतना ही निर्दोष (perfect) तथा सोद्देश्य (purposeful) भी बनाते हैं। वस्तुएं जितनी अच्छी और उपयुक्त हों, उन्हें बनाने के लिए उतनी ही अधिक कुशलता (skill) की ज़रूरत होती है, उत्पादन प्रक्रिया का स्वभाव जितना ज़्यादा रचनात्मक (creative) हो, उसके सर्जक (creator) से उतनी ही अधिक प्रतिभा (talent) तथा कल्पनाशीलता (inventiveness) की अपेक्षा की जाती है। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य की तर्कबुद्धि (reasoning) और संकल्प (will), उसकी विशिष्ट मानवीय शक्ति परिष्कृत हो गये। मनुष्य, प्रकृति से जितना पृथक हुआ और उसने अपने को उससे जितना ऊपर उठा लिया, उतना ही उसने अपने को और अपनी कुशलताओं, ज्ञान तथा व्यवहार के मानकों को परिष्कृत बनाया और फलत:, स्वयं को एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढाल लिया।

मनुष्य की यह सारी विशेषताएं और, सर्वोपरि, उसका सारा सामाजिक सार (social essence), उसके ज्ञान का बल, कल्पना और संस्कृति की शक्ति और साथ ही क्रियाकलाप का परिष्करण (perfection) और पारंगति (mastery) उन वस्तुओं में, संरचनाओं में, औज़ारों में और सुधरी हुई, रूपांतरित (transformed), मानवीकृत प्रकृति में मूर्त (embodied) हुए जिन्हें उसने बनाया। यह मूर्तता (embodiment) जितनी ज्यादा और पूर्ण होती है, उसके श्रम तथा उसकी रचनात्मक क्रिया की भौतिक वस्तुएं उतनी ही उत्कृष्ट और सुंदर होती हैं। इतिहासाश्रित श्रम विभाजन के ज़रिये उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन, सुंदर वस्तुओं के उत्पादन से पृथक हो गया। क्रियाकलाप के एक विशेष रूप में कला, ‘सुंदर का उत्पादन’ भौतिक उत्पादन से पृथक हो गयी। लोगों के एक ऐसे विशेष समूह का उद्भव हुआ, जिनके लिए कला व्यवसाय (profession) बन गई - कलाकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, लेखक, कवि, संगीतज्ञ, अभिनेता तथा अन्य।

वर्ग समाज (class society) में, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant classes) कला के विशेष उपभोक्ता होते हैं। वे कलाकारों, लेखकों और अभिनेताओं को वित्तीय सहायता देते हैं, उनका रचनात्मक श्रम ख़रीदते हैं और साथ ही उन्हें निश्चित वर्गों के उद्देश्यों की सेवा करने तथा एक विश्वदृष्टिकोण और वैचारिकी का सचेतन या अचेतन वाहक बनने को बाध्य करते हैं। परंतु यह सोचना गलत होगा की कला, यानी कलात्मक क्रियाकलाप भौतिक उत्पादन से पूर्ण तरह अलग हैं। यहां तक कि शोषक समाजों में भी कारीगरों, दस्तकारों और किसानों के कृतित्व में पूर्णता के लिए प्रयत्न निहित होते हैं तथा उसमें रचनात्मक मानवीय तत्व अभिव्यक्त होते हैं। जिस सीमा तक काम में स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता के तत्व होते हैं, उस सीमा तक उसमें कलात्मक गुण भी होते हैं। काम जितना स्वतंत्र और रचनात्मक होता है, वह कला के उतने ही निकट होता है।

श्रम के आधार पर विकसित होने वाले सारे मानवीय क्रियाकलाप की सब अभिव्यक्तियों में कलात्मक क्रियाकलाप के तत्व निहित होते हैं। मनुष्य का संपूर्ण सामाजिक सत्व (social being), जो इस क्रियाकलाप का एक उत्पाद है, कमोबेश रचनात्मक, कलात्मक तत्वों से व्याप्त (permeated) होता है और यह भी सामाजिक चेतना के, अर्थात कलात्मक चेतना के एक विशेष रूप में परिवर्तित होता है, जो कलात्मक बिंबों की एक प्रणाली मैं हमारे गिर्द की यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। ये बिंब, व्यष्टिक और सामान्य (individual and general) को, प्रकृति और समाज की लाक्षणिक विशेषताओं, अनुगुणों (properties) और अवगुणों (peculiarities) तथा मनुष्य के आंतरिक जगत को परावर्तित करते हैं। इसके उपरांत उन्हें तदनुरूप (corresponding) भौतिक वस्तुओं व प्रक्रियाओं, संगीत की रचनाओं, चित्रों, मूर्तियों, वास्तुकला संरचनाओं, रंगमंचीय प्रस्तुतियों तथा फ़िल्मों में मूर्त रूप दिया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

1 टिप्पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, वीरांगना रानी दुर्गावती का ४५४ वां बलिदान दिवस “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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