शुक्रवार, 18 मार्च 2011

स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति की संकल्पना पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत
( psychological theories of memory )

स्मृति विषयक अध्ययनों का मनोवैज्ञानिक स्तर कालक्रम की दृष्टि से सबसे पुराना है और सबसे अधिक प्रवृत्तियां व सिद्धांत इसी स्तर से संबंध रखते हैं। उनके वर्गीकरण तथा मूल्यांकन का एक आधार यह हो सकता है कि वे स्मृति की प्रक्रियाओं के निर्माण में मनुष्य की क्रियाशीलता की क्या भूमिका मानते हैं और क्रियाशीलता की प्रकृति की क्या व्याख्या करते हैं। स्मृति विषयक अधिकांश मनोवैज्ञानिक सिद्धांत या तो केवल विषय ( स्मृति की वस्तु, सामग्री ) पर ध्यान केन्द्रित करते हैं या फिर केवल कर्ता ( चेतना की ‘शुद्ध’ क्रियाशीलता ) पर, और कर्ता तथा वस्तु की अन्योन्यक्रिया ( interaction ) के अर्थगत क्षेत्र को, मनुष्य की सक्रियता को अनदेखा कर डालते हैं। इस कारण इन सभी सिद्धांतों को एकांगी ( unilateral ) कहा जा सकता है।

स्मृति विषयक मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों में सबसे पहले वे सिद्धांत आते हैं, जिनका संबंध साहचर्यवाद से है। इनकी मुख्य प्रस्थापना यह है कि साहचर्य ( association ) अथवा मानसिक संबंध सभी मानसिक निर्मितियों का एक आवश्यक मूलतत्व है। इसके अनुसार यदि चेतना में निश्चित मानसिक निर्मितियां एक साथ अथवा एक के बाद एक करके पैदा हुई हैं, तो उनके बीच एक साहचर्यात्मक संबंध ( associative relationship ) बन जाता है, जिससे कि इस श्रृंखला की किसी भी कड़ी का पुनर्प्रकटन ( re-appearance ) चेतना में अनिवार्यतः अन्य सभी कड़ियों का परिकल्पन उपस्थित कर देता है।

इस प्रकार साहचर्यवाद के अनुसार चेतना में दो छापों की उत्पत्ति की एककालिकता ( simultaneity ) उनके बीच संबंध के निर्माण के लिए आवश्यक तथा पर्याप्त आधार है। यह प्रस्थापना इसके पक्षधरों को याद करने के क्रियातंत्रों का गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता से मुक्त कर देती थी, इसलिए वे अपने को ‘एककालिक छापों’ की उत्पत्ति के लिए जरूरी बाह्य परिस्थितियों के वर्णन तक सीमित रख सकते थे। उन्होंने इन परिस्थितियों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा:  (क) संबंधित वस्तुओं की देशिक तथा कालिक परस्पर-संलग्नता, (ख) उनकी समानता और (ग) उनका भेद अथवा विलोमता। इन्हीं तीन प्रभेदों के आधार पर उन्होंने साहचर्य के तीन रूप बताए: संलग्नतामूलक साहचर्य, साम्यमूलक साहचर्य और विरोधमूलक साहचर्य। इन तीन शीर्षों के अंतर्गत ही साहचर्यवादियों ने खींच-तानकर सभी प्रकार के संबंध शामिल कर दिये, जिनमें कार्य-कारण संबंध भी आते हैं। उनका कहना था कि कार्य और कारण आपस में हमेशा कालगत संबंध से जुडे होते हैं ( एतद्‍कारण, अतः एतद्‍ उपरांत ), इसलिए उन्होंने कार्य-कारण साहचर्यों को संलग्नतामूलक साहचर्यों की श्रेणी में रखा।

साहचर्य की धारणा की आगे चलकर एक नयी, अधिक गहन व्याख्या की गई। याद करना व याद रखना वास्तव में नये को मनुष्य के अनुभव में पहले से विद्यमान पुराने से जोड़ना है। यह जोड़ने की क्रिया तब स्पष्टतः दिखायी देती है, जब हम एक-एक चीज़ करके स्मृति की अगली प्रक्रिया, किसी सामग्री की पुनर्प्रस्तुति, को साकार बनाने में सफलता पाते हैं। हम किसी चीज़ को, उदाहरण के लिए, गांठ लगाकर रखने वाला तरीक़ा इस्तेमाल करके कैसे याद करते हैं? गांठ देखते ही हमें वह स्थिति याद आ जाती है, जिसमें हमने उसे बांधा था, स्थिति हमें याद दिलाती है कि हम किससे क्या बात कर रहे थे और इस तरह अंत में हमें याद आ जाता है कि हमने क्या याद करने के लिए यह गांठ बांधी थी। किंतु अगर ऐसी साहचर्य-श्रृंखलाओं का निर्माण परिघटनाओं ( phenomena ) की देशिक तथा कालिक संलग्नता ( involvement ) पर ही निर्भर हो, तो एक ही स्थिति अलग-अलग व्यक्तियों में एक ही जैसे साहचर्य जागृत करेगी। वास्तव में साहचर्य चयनात्मकतः ( selectively ) पैदा होते हैं और साहचर्यात्मक मनोविज्ञान ( associative psychology ) के प्रतिपादकों ने इस चयनात्मकता ( selectivity ) के निर्धारी कारक ( determining factors ) नहीं बताए। सच तो यह है कि वे तथ्यों का उल्लेख भर करने से आगे नहीं जा सके थे और इन तथ्यों की वैज्ञानिक व्याख्या बहुत बाद में जाकर ही की गई।

साहचर्यवाद के आलोचनात्मक विश्लेषण ( critical analysis ) ने मनोविज्ञान में स्मृति विषयक कई नये सिद्धांतों व संकल्पनाओं ( concepts ) के लिए आधार प्रदान किया। उनकी सारवस्तु काफ़ी हद तक इससे निर्धारित होती है कि उन्होंने साहचर्यात्मक मनोविज्ञान की किस बात को अपनी आलोचना का विषय बनाया था और स्वयं साहचर्य की अवधारणा के प्रति उनका क्या रवैया ( attitude ) है।

साहचर्यवाद के विरुद्ध सबसे कड़ा रवैया गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के प्रतिपादकों ने अपनाया ( जर्मन शब्द ‘गेस्टाल्ट’ का अर्थ है ‘बिंब’, ‘आकृति’, ‘नमूना’ )। यह सिद्धांत प्रत्यक्ष ( perception ) की जा रही संरचना ( structure ) को उसके अलग-अलग तत्वों ( elements ) की समष्टि नहीं, अपितु एक अविभाज्य ( integral ) संरचना मानता है। गेस्टाल्ट मनोविज्ञानियों ने साहचर्यात्मक मनोविज्ञान के घटकमूलक उपागम ( approach ) का विरोध किया और उसके मुकाबले में संश्लेषण ( synthesis ) का सिद्धांत, अंशों की तुलना में समग्र की आद्यता ( permittivity ) का सिद्धांत रखा। इसके अनुसार सामग्री का ढांचा आधार ( base ) है और मस्तिष्क में चिह्न की इससे मिलती-जुलती संरचना इसका व्युत्पाद ( derivative ) है ( समाकृति या संरचनात्मक समानता का सिद्धांत )।

बेशक सामग्री का एक निश्चित ढांचा याद करने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किंतु स्वयं ढांचा अपने में मनुष्य की सक्रियता के कार्य के अलावा कुछ नहीं है। गेस्टाल्ट मनोविज्ञानी समग्रता को आद्य और अंतिम तत्व घोषित करते हैं और गेस्टाल्ट के नियमों को, जैसा कि हमने साहचर्य के नियमों के मामले में भी देखा था, मनुष्य की सक्रियता से बाहर तथा स्वतंत्र मानते हैं। प्रणालीतांत्रिक दृष्टि से गेस्टाल्ट और साहचर्यात्मक मनोविज्ञान एक ही कोटि में आते हैं।

मानव चेतना को एक निष्क्रिय तत्व माननेवाले साहचर्यवाद और अन्य सिद्धांतों के विपरीत मनोविज्ञान की बहुत-सी प्रवृत्तियों ने स्मृति से संबंधित प्रक्रियाओं में चेतना की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया और स्मरण तथा पुनर्प्रस्तुति में ध्यान, अभिप्राय ( intention ) तथा समझ के महत्त्व पर ज़ोर दिया। किंतु इन सिद्धांतों में भी स्मृति-प्रक्रियाएं वास्तव में मनुष्य की सक्रियता से असंबद्ध थी और इसीलिए उनकी ग़लत व्याख्या की गई थी। उदाहरण के लिए, अभिप्राय को मात्र एक इच्छामूलक प्रयास अथवा चेतना की ऐसी ‘शुद्ध’ क्रियाशीलता माना गया था, जो स्मरण तथा पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रियाओं में कोई परिवर्तन नहीं लाती।

हाल के वर्षों में उस सिद्धांत को विशेष मान्यता प्राप्त हुई है, जो मनुष्य की सक्रियता को स्मृति समेत सभी मानसिक प्रक्रियाओं के जन्म व विकास का निर्धारी कारक मानता है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी सामग्री को याद करने, याद रखने और पुनर्प्रस्तुत करने की प्रक्रियाएं मनुष्य की सक्रियता के लिए उस सामग्री के महत्त्व पर निर्भर होती हैं।

प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि स्मृति में सर्वाधिक फलप्रद संबंध उन मामलों में बनते हैं, जब ऐसी सामग्री क्रिया के उद्देश्य से घनिष्ठतः जुड़ी होती हैं। ऐसे संबंधों के लक्षण, यानि उनकी दृढ़ता और अस्थिरता मनुष्य की आगे की सक्रियता में संबंधित सामग्री की सहभागिता ( participation ) की मात्रा पर और निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के दृष्टिकोण से इन संबंधों के महत्त्व ( importance ) पर निर्भर होती है।

इस तरह पूर्वचर्चित सिद्धांतों की तुलना में इस सिद्धांत की मुख्य प्रस्थापना को यों सूत्रबद्ध किया जा सकता है : विभिन्न परिकल्पनों के बीच संबंधों का निर्माण याद की जा रही सामग्री से अधिक इसपर निर्भर होता है कि स्मरणकर्ता इस सामग्री का क्या करता है



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं।
आइए इस शुभ अवसर पर वृक्षों को असामयिक मौत से बचाएं तथा अनजाने में होने वाले पाप से लोगों को अवगत कराएं।

Dorothy ने कहा…

नेह और अपनेपन के
इंद्रधनुषी रंगों से सजी होली
उमंग और उल्लास का गुलाल
हमारे जीवनों मे उंडेल दे.

आप को सपरिवार होली की ढेरों शुभकामनाएं.
सादर
डोरोथी.

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