शनिवार, 12 मार्च 2011

स्मृति की संकल्पना ( the concept of memory )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति की संकल्पना पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्मृति की संकल्पना
( the concept of memory )

मन की एक मुख्य विशेषता यह है कि मनुष्य द्वारा बाह्य प्रभावों के प्रतिबिंब को लगातार अपने आगे के व्यवहार में इस्तेमाल किया जाता है। व्यवहार की बढ़ती हुई जटिलता का एक कारण मनुष्य के अनुभव का बढ़ना है। यदि प्रांतस्था ( cortex ) में पैदा होने वाले परिवेश के बिंब अपने पीछे कोई भी निशान छोड़े बिना लुप्त होते रहते, तो अनुभव का संचय ( accumulation of experiences ) असंभव हो जाता। आपस में विभिन्न संबंध बनाते हुए ये बिंब दीर्घ समय तक सुरक्षित रहते हैं और जीवन तथा सक्रियता की आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्प्रस्तुत किये जाते हैं।

मनुष्य द्वारा अपने अनुभव को याद करने, याद रखने तथा बाद में पुनर्प्रस्तुत करने को स्मृति ( memory ) कहते हैं। इसमें चार मुख्य प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं : स्मरण ( याद करना ), स्मृति में धारण ( याद रखना ), पुनर्प्रस्तुति तथा विस्मरण ( भूल जाना )। ये मन की स्वतंत्र क्षमताएं नहीं है। उनका निर्माण सक्रियता के दौरान होता है और उनसे ही वे निर्धारित भी होती हैं। मनुष्य द्वारा किसी नई सामग्री का स्मरण उसकी जीवनावश्यक सक्रियता के दौरान व्यक्तिगत अनुभव के संचय से जुड़ा होता है। याद किये हुए को बाद में सक्रियता में इस्तेमाल करने के लिए उसकी पुनर्प्रस्तुति की आवश्यकता होती है। यदि कोई सामग्री सक्रियता से बाहर रहती है, तो वह भूल जाती है। सामग्री को याद रखना, अर्थात स्मृति में धारण करना सक्रियता में भाग लेने पर निर्भर होता है. क्योंकि मनुष्य का व्यवहार हर दत्त क्षण में उसके समस्त जीवनानुभव से निर्धारित होता है।

इस तरह स्मृति मनुष्य के मानसिक जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण तथा निश्चायक ( conclusive ) लाक्षणिकता है। स्मृति की भूमिका को विगत के बिंबों के निर्माण के समानार्थी नहीं माना जा सकता ( मनोविज्ञान में ऐसे बिंबों को परिकल्पन कहा जाता है )। स्मृति की प्रक्रियाओं के बाहर कोई भी क्रिया संभव नहीं है, क्योंकि साधारण से साधारण मानसिक क्रिया के लिए भी उसके हर वर्तमान तत्व को बाद के तत्वों से ‘संबद्ध’ ( relate ) करने के लिए याद रखे रहना अत्यावश्यक होता है। ऐसी ‘संबद्धता’ के क्षमता के बिना कोई भी विकास नहीं किया जा सकता। यदि मनुष्य में ऐसी क्षमता न हो, तो वह सदा एक नवजात शिशु जैसा बना रहेगा।

सभी मानसिक प्रक्रियाओं की सबसे महत्त्वपूर्ण लाक्षणिकता होने के कारण स्मृति मनुष्य के व्यक्तित्व की एकता व अविभाज्यता ( unity and indivisibility ) को सुनिश्चित करती है।

स्मृति को सभी मनोविज्ञान में सर्वाधिक गवेषित ( explored ) क्षेत्र माना जाता था। किंतु उसके नियमों के बारे में हाल में की गई खोजों ने उसको फिर से प्रमुखता प्रदान कर दी है। ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों, जिनमें प्रोद्योगिकी ( technology ) जैसे मनोवैज्ञानिक शोध से स्पष्टतः दूर का वस्ता रखने वाले क्षेत्र भी शामिल हैं, प्रगति का निर्धारण आज स्मृति से संबंधित इन खोजों के परिणामों से हो रहा है।

स्मृति से संबंधित समकालीन अध्ययन अपना ध्यान उसके क्रियातंत्रों पर केंद्रित करते हैं और इन क्रियातंत्रों की समझ के बार में वैज्ञानिकों में जो मतभेद हैं, वे ही स्मृति विषयक विभिन्न सिद्धांतों का आधार बने हैं। विभिन्न शाखाओं के विशेषज्ञों द्वारा अपने अनुसंधानों का दायरा बढ़ाये जाने के कारण बहुत सारी तरह-तरह की प्राक्कल्पनाएं ( hypothesis ) तथा मॉडल प्रतिपादित किये गये हैं। दो परंपरागत स्तरों, मनोवैज्ञानिक तथा तंत्रिकाक्रियात्मक स्तरों, के अलावा जीवरासायनिक स्तर पर भी स्मृति विषयक शोध किये जा रहे हैं। स्मृति के क्रियातंत्रों और नियमसंगतियों के बारे में एक अन्य उपागम, साइबरनेटिकी ने भी तेज़ी से प्रमुखता पाई है।

अगली बार हम स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर एक संक्षिप्त अवलोकन प्रस्तुत करेंगे, और स्मृति की प्रक्रिया को समझने की कोशिश जारी रखेंगे।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

JOBS WORLD ने कहा…

स्मृति को लेकर बेहद शानदार पोस्ट।

नेहा ने कहा…

bahut hi rochak post hai.

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