शनिवार, 3 जनवरी 2015

परावर्तन के रूप में संज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तत्वमींमासीय भौतिकवाद की संज्ञान विषयक अवधारणा पर संक्षिप्त विवेचना प्रस्तुत की थी, इस बार हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि परावर्तन के रूप में संज्ञान आख़िर क्या है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



परावर्तन के रूप में संज्ञान
( cognition as reflection )

विश्व की ज्ञेयता ( knowability ) का, सत्य ( truth ) को समझने की मानव चिंतन की क्षमता का प्रश्न, विज्ञान और व्यवहार ( practice ) के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि विश्व और उसके विकास के नियम संज्ञेय हैं और हमारा ज्ञान वास्तविकता का सही परावर्तन ( reflection ) है, तो प्रकृति तथा समाज की संज्ञात शक्तियों को मानवजाति की सेवा में लगाया जा सकता है। संज्ञान की प्रकृति को समझने की कोशिशों में हम देखते हैं कि सारे भौतिकवादी ( materialistic ) इस बात पर सहमत हैं कि संज्ञान, यथार्थता ( reality ) के परावर्तन का एक विशेष रूप ( form ) है। परंतु यह विशेष रूप क्या है? हम यहां पहले इस पर विस्तार से देख चुके हैं कि परावर्तन भूतद्रव्य ( matter ) का एक सार्विक अनुगुण ( universal property ) है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि परावर्तन के हर स्तर पर संज्ञान होता है। संज्ञान केवल मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही उत्पन्न हुआ।

हमारा सारा ज्ञान या तो किन्हीं घटनाओं और प्रक्रियाओं से संबंधित होता है, या मानवीय क्रियाकलाप ( human activity ) के कुछ कार्यों तथा रूपों से। जब हम दो संख्याओं को जोडने या गुणा करने की आवश्यकता की बात करते हैं, तो हमें सिर्फ़ यही जानना नहीं होता कि संख्याएं क्या हैं, बल्कि यह भी जानना होता है कि योग या गुणा की संक्रिया ( operation ) कैसे की जाती है। जब हम एक इमारत का निर्माण शुरू करते हैं, तो हमें सिर्फ़ यही नहीं जानना होता कि ईटें तथा संरचनात्मक ( structural ) तत्व, आदि क्या होते हैं, बल्कि यह भी जानना होता है कि इमारत बनाने का काम कैसे किया जाता है।

ज्ञान को हमेशा उन अलग-अलग शब्दों या शब्द समूहों के रूप में भाषा द्वारा व्यक्त किया जाता है, जिनके ज़रिये संकल्पनाएं ( concepts ) निरूपित की जाती हैं और उन वाक्यों तथा प्रस्थापनाओं ( propositions ) से व्यक्त किया जाता है, जिनके ज़रिये वस्तुओं के अनुगुणों, विविध प्रकार के मानवीय कर्मों तथा उनके बीच संबंधों का वर्णन किया जाता है। अमुक-अमुक वाक्य किसी के आंतरिक संवेदनों ( sensations ) या मानसिक प्रक्रियाओं का वर्णन भी कर सकते हैं। एक तरफ़, पृथक-पृथक शब्दों, शब्द समूहों या वाक्यों के और, दूसरी तरफ़, बाह्य जगत की घटनाओं के बीच ऐसी बाहरी सादृश्यता ( likeness ) या समानता नहीं होती है, जिसे संवेद अंगों ( sense organs ) से जाना जा सके।

इसलिए जब हम कहते हैं कि हमारा ज्ञान वास्तविकता को परावर्तित करता है, तो हमारा तात्पर्य बाह्य जगत की घटनाओं तथा मनुष्यों द्वारा किये गये कुछ कर्मों के साथ, संकल्पनाओं तथा निर्णयों ( कथनों ) की विशेष अनुरूपता ( correspondence ) से होता है। इसका यह मतलब है कि कुछ घटनाएं, प्रक्रियाएं या क्रियाओं के रूप, कुछ निश्चित संकल्पनाओं के अनुरूप होते हैं। इसका यह मतलब भी है कि हम कुछ कथनों ( statements ) के ज़रिये वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) की घटनाओं और प्रक्रियाओं के नितांत निश्चित अनुगुणों का तथा उनके बीच संबंधों का वर्णन कर सकते हैं और उन्हें पहचान सकते हैं। और अंत में, इसका यह मतलब है कि कार्यकलाप के कुछ नियमों को निरूपित करते तथा आदेश और हिदायतें देते या लेते समय हम जानते हैं ( समझते हैं ) कि अमुक-अमुक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्या-क्या कार्य किये ही जाने चाहिए और क्या-क्या कार्य नहीं किये जाने चाहिए। यह इस कथन का अर्थ है कि हमारा ज्ञान वस्तुगत यथार्थता का एक परावर्तन है।

यानि इस बात को एक प्रस्थापना के रूप में कहा जा सकता है कि ‘बाह्य जगत का वस्तुगत अस्तित्व है और वह मानव चेतना में परावर्तित होता है’। इसका मतलब है कि वास्तविकता की वस्तुएं और घटनाएं मनुष्य के संवेदी अंगों पर प्रभाव डालकर संवेदों ( sensations ) और अवबोधनों ( perceptions ) की उत्पत्ति करती हैं, जिनके आधार पर मनुष्य संकल्पनाओं का विस्तारण करता है। अतएव यह कहा जा सकता है कि हमारे ज्ञान का स्रोत बाह्य जगत है। लेकिन संज्ञान की प्रक्रिया आस-पास के जगत का एक निष्क्रिय ( passive ) परावर्तन नहीं है। लोग प्रकृति और समाज को सक्रियता से रूपांतरित ( transform ) करते हैं और यह सक्रियता उनके सामने विभिन्न समस्याएं पैदा कर देती है, जिनके समाधानार्थ प्राकृतिक और सामाजिक नियमों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। फलतः संज्ञान वास्तविकता का निष्क्रिय अवलोकन नहीं, बल्कि उसका सक्रिय तथा सोद्देश्य परावर्तन है

ज्ञान, स्वयं अपने आप या स्वयं अपने में अस्तित्वमान नहीं होता है। यह एक विशेष प्रक्रिया का, संज्ञान या जानने की प्रक्रिया, यानी मनुष्य की संज्ञानात्मक क्रिया का परिणाम ( result ) है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) मानव संज्ञान को सामाजिक विकास के एक उत्पाद ( product ) के, आस-पास के जगत के मनुष्य द्वारा रूपांतरण के परिणाम के रूप में देखता है। प्रकृति और समाज के रूपांतरण के उद्देश्य से किये जाने वाले मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप संज्ञान का आधार और लक्ष्य हैं। संज्ञान के सारे प्रकार व्यवहार ( practice ) के, संयुक्त मानवीय श्रम ( labour ) के दौरान रूप ग्रहण करते हैं। मनुष्य, समाज में रहते हुए विश्व को जानता-पहचानता है और पूर्ववर्ती पीढ़ियों द्वारा संचित ( accumulated ) और उत्पादन के औज़ारों में घनीभूत ( condensed ) तथा भाषा, विज्ञान, संस्कृति, आदि में अभिलिखित अनुभव का उपयोग करता है।

फलतः ज्ञान के सार ( essence ) को अधिक गहराई तथा सटीकता से समझने के लिए और इस प्रश्न कि जानने का क्या मतलब है, का उत्तर देने के लिए संज्ञान की प्रक्रिया, उसके स्रोतों तथा उन मुख्य अवस्थाओं का अध्ययन करना जरूरी है, जिनमें मानवीय ज्ञान निरूपित ( formulated ) होता तथा रचा जाता है। यह समझना भी महत्त्वपूर्ण है कि वस्तुगत यथार्थता के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता को कैसे परखा जाता है और कैसे उसकी पुष्टि की जाती है तथा इस अनुरूपता को गहनतर ( deeper ) और पूर्णतर ( fuller ) बनाने के लिए क्या करना जरूरी है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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