शनिवार, 22 अगस्त 2015

संज्ञान की निगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक पद्धतियों के वर्गीकरण पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की निगमनात्मक विधियां
( Deductive methods of cognition )

किसी भी विज्ञान के नियम, प्राक्कल्पनाएं तथा सिद्धांत ज्ञान का एक विशेष स्तर होती हैं जिसे सैद्धांतिक ( theoretical ) कहा जाता है। प्रत्यक्ष प्रेक्षणों तथा प्रयोगों पर, यानी संवेद प्रत्यक्षों पर आधारित ज्ञान उसका दूसरा स्तर है, जिसे आनुभविक ( empirical ) स्तर कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान में ज्ञान के सैद्धांतिक तथा आनुभविक स्तर के बीच बड़े जटिल संबंध होते हैं। आधुनिक भौतिकी, साइबरनेटिकी, खगोलविद्या, जैविकी तथा अन्य विज्ञानों के सिद्धांत, प्राक्कल्पनाएं और नियम अत्यंत अमूर्त ( abstract ) होते हैं और उन्हें ऐसी किन्हीं दृश्य, रैखिक मॉडलों, संकल्पनाओं तथा कथनों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है जो संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत घटनाओं के तुल्य या उन पर अनुप्रयोज्य ( applicable ) हों। ज्ञान के इन रूपों को आम तौर पर गणित के समीकरणों जैसे जटिल प्रतीकात्मक रूपों तथा अमूर्त तर्किक फ़ार्मूलों में व्यक्त किया जाता है। इनको यथार्थता ( reality ) पर लागू करने तथा उनकी सत्यता को परखने के लिए ज्ञान के आनुभविक स्तर की तुलना सैद्धांतिक स्तर से करनी पड़ती है, उनका आमना-सामना करना पड़ता है। इसके लिए संज्ञान की निगमनात्मक विधि ( deductive method ) का इस्तेमाल किया जाता है।

निगमन पद्धति में चिंतन, सामान्य ( general ) से विशेष ( particular ) की ओर जाता है। इस विधि में सामान्य सिद्धांतों, आधारिकाओं ( premises ) से, कम सामान्य या विशिष्ट निष्कर्ष प्राप्त किये जाते हैं। निगमनात्मक पद्धति सैद्धांतिक सामग्री को तार्किक क्रम तथा पूर्णता प्रदान करती है, उसे प्रमाणित व व्यवस्थित करने में मदद देती है। इस विधि में एक सिद्धांत की प्रमुख प्रारंभिक प्राक्कल्पनाओं ( hypotheses ) तथा नियमों को सुसंगत ढंग तथा सख़्ती से परिभाषित, तार्किक और गणितीय क़ायदों द्वारा रूपांतरित ( transform ) किया जाता है। इन रूपांतरणों के फलस्वरूप सूत्रों, प्रमेयों ( theorems ) या प्रस्थापनाओं ( propositions ) की एक लंबी श्रृंखला बन जाती है जो कुछ नियमितताओं को व्यक्त करती है या अध्ययनाधीन वस्तु के निश्चित अनुगुणों ( properties ) तथा संपर्कों ( connections ) का वर्णन करती है। प्रारंभिक बुनियादी नियमों और प्राक्कल्पनाओं से व्युत्पन्न ( derived ) इस ज्ञान की रचना प्रक्रिया को निगमन ( deduction ) कहते हैं और प्राप्त ज्ञान निगमनात्मक ज्ञान है।

निगमनात्मक पद्धति का एक गुण यह है कि इसकी सहायता से निकाले गये निष्कर्ष भली भांति प्रमाण्य ( demonstrable ) होते हैं और परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान सच्चा और प्रामाणिक ( authentic ) होता है। सही-सही आधारिकाओं से हम तार्किक ढंग से आवश्यक सहज परिणामों को निगमित कर सकते हैं। अगर हमारे पूर्वाधार सही हैं और हम उन पर चिंतन के नियमों को सही ढ़ंग से लागू करते है, तो हमारे निष्कर्ष वास्तविकता के साथ मेल खाते है उसके अनुरूप होते हैं

निगमनात्मक विधि से एक ऐसे क्लिष्ट और अमूर्त सिद्धांतों, जिनमें की प्रत्यक्ष अनुभूतियों का, आनुभाविक स्तर की प्रामाणिकता का अभाव होता है, की बुनियादी प्रस्थापनाओं और नियमों की एक सापेक्षतः छोटी सी संख्या से विभिन्न रूपांतरणों के ज़रिये इस तरह के निष्कर्षों तथा उपप्रमेयों की एक बहुत बड़ी संख्या हासिल करना संभव हो जाता है, जिनको की प्रत्यक्ष संवेदों की अनुभूतियों द्वारा आनुभविक स्तर पर प्रमाणित किया जा सकता है। इस तरह प्रत्यक्षीकृत भौतिक यथार्थता पर अनुप्रयोज्य सिद्धांतों तथा नियमों को एक आनुभविक, यानी संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत आशय प्रदान किया जाता है।

उदाहरण के लिए, फ़ार्मूलों में निहित चरों की तुलना कुछ उपस्करों ( instruments ) के पैमानों, विभिन्न विद्युतीय सुइयों या प्रदर्शन पटों के पाठ्यांकों या साधारण दृश्य और श्रव्य प्रेक्षणों, आदि से की जाती है। इस तरह, ज्ञान के सैद्धांतिक और आनुभविक स्तरों के बीच संबंध को और विस्तृतम अर्थ में प्रयोग, प्रेक्षण तथा व्यवहार के साथ सिद्धांत के संबंध को निगमनात्मक विधि से उद्घाटित किया जाता है। मसलन, क्वांटम यांत्रिकी के बुनियादी नियम, स्वयं यथार्थता ( reality ) पर प्रत्यक्ष अनुप्रयोज्य नहीं हैं और प्रायोगिक प्रेक्षणों के परिणामों के साथ तुल्य नहीं हैं। लेकिन गणितीय रूपांतरणों की बदौलत क्वांटम भौतिकी के बुनियादी नियमों की सत्यता को प्रदर्शित ही नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके अत्यंत व्यापक व्यावहारिक अनुप्रयोग ( application ) भी खोजे जा सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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