शनिवार, 29 अगस्त 2015

संज्ञान की आगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की गमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की आगमनात्मक विधियां
( Inductive methods of cognition )

जहां निगमनात्मक ( deductive ) विधि के ज़रिये ज्ञान के सैद्धांतिक स्तर से आनुभविक स्तर की ओर जाना संभव है, वहीं आगमनात्मक ( inductive ) विधि से उल्टी दिशा में जाना संभव हो जाता है, यानी आनुभविक स्तर से सैद्धांतिक स्तर की ओर। 

व्यवहार में और वैज्ञानिक प्रेक्षण तथा प्रयोग में वैज्ञानिकगण किसी घटना, प्रकृति या सामाजिक जीवन से संबंधित एकसमान तथ्यों को कमोबेश बड़ी संख्या में संचित करते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या संयोग तथा परिवर्तनों के अधीन अलग-अलग, असमन्वित ( uncoordinated ) तथ्यों से उनका संनियमन ( govern ) करने वाले वस्तुगत नियमों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है? वैज्ञानिक ज्ञान की रचना करनेवाली आगमनात्मक विधि क़ायदों का, एक तरह का ऐसा समुच्चय है, जिसकी मदद से संवेदनों द्वारा किये गये प्रेक्षणों तथा अलग-अलग तथ्यों के आनुभविक ज्ञान से उनकी बुनियाद में निहित नियमों तक, उनके सार के सैद्धांतिक ज्ञान तक पहुंचा जा सकता है।

आगमन ( induction ), चिंतन का पृथक-पृथक विशेष ( particular ) तथ्यों से सामान्य प्रस्थापना ( general proposition ) की ओर, कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर आना है। आगमन प्रांरभिक आधारिकाओं ( premises ) से अधिक व्यापक सामान्यीकारक निष्कर्ष निकालना संभव बनाता है। आगमनात्मक पद्धति संज्ञानात्मक प्रक्रिया की उन शुरुआती मंज़िलों में कारगर होती है, जब मनुष्य को अनुभवात्मक ज्ञान का बोध होता है, जब वह तथ्यों व आधार-सामग्री का संचय व सामान्यीकरण करता है, एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) को निरूपित करता है और उसकी सच्चाई को जांचता है। इस पद्धति का एक गुण यह है कि इसे केवल एक ही विशेष तथ्य के आधार पर भी विश्लेषण और सामान्यीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी विशेषता स्वयंसिद्ध हैं।

आगमनात्मक पद्धति के सुव्यवस्थित उपयोग से ठोस स्थितियों का विश्लेषण करने, तथ्यात्मक सामग्री का सामान्यीकरण करने, प्राक्कल्पनाओं को पेश करने तथा उनकी सच्चाई परखने की क्षमता विकसित होती है। आगमनात्मक विधि का अनुप्रयोग गणितीय सांख्यिकी तथा प्रसंभाव्यता के सिद्धांत ( theory of probability ) के वैज्ञानिक संज्ञान में व्यापक उपयोग से संबंद्ध है। प्रसंभाव्यता सिद्धांत के ज़रिये प्रयोगों, आदि की एक पूरी श्रृंखला में कुछ अनुगुणों ( properties ) के विकास की प्रसंभावना का परिमाणात्मक ( quantitative ) अनुमान लगाया जा सकता है। यदि प्रक्रिया या अनुगुण के स्थायित्व की प्रसंभाव्यता की कोटि बहुत ऊंची है, तो उनके ज्ञान को विज्ञान का नियम माना जा सकता है।

पृथक्कीकृत ( isolated ) भौतिक प्रणालियों में ऊर्जा के नियम ( क्लासिक तापगतिकी का दूसरा नियम ), प्राकृतिक वरण ( natural selection ) का डार्विनीय नियम तथा आधुनिक विज्ञान की अन्य नियमितताओं ( regularities ) तथा नियमों की खोज ऐसे ही की गयी थी। अलग-अलग आंशिक प्रेक्षणों से अधिक सामान्य सैद्धांतिक ज्ञान की तरफ़ जाना संभव बनानेवाली आगमनात्मक विधि विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

2 टिप्पणियां:

Chāru Samvād ने कहा…


संज्ञान की निमनात्मक विधि के पश्चात् अब आगमनात्मक की चर्चा:

भाषा की अनावश्यक दुर्बोधता के कारण निर्बाध संचरण की स्थिति कमजोर हुई है।इसके अलावा विषयवस्तु का किंचित विस्तार इसे 'स्वान्तः सुखाय' से 'सुरसरि सम सब कर हित' जैसी गरिमा प्रदान कर सकता था।

Chāru Samvād ने कहा…


संज्ञान की निमनात्मक विधि के पश्चात् अब आगमनात्मक की चर्चा:

भाषा की अनावश्यक दुर्बोधता के कारण निर्बाध संचरण की स्थिति कमजोर हुई है।इसके अलावा विषयवस्तु का किंचित विस्तार इसे 'स्वान्तः सुखाय' से 'सुरसरि सम सब कर हित' जैसी गरिमा प्रदान कर सकता था।

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