शनिवार, 1 सितंबर 2012

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है


हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है

मुझे कुछ रुखापन नहीं लगा।.....क्योंकि लेखों से दिखता है कि.....समीक्षक हैं और समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे.....एक बात चलते-चलते कि लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे? चापलूसी से, नहीं, ठीक नहीं है। यह तो राजनीति के नेताओं की तरकीब है। लोग स्वीकारते नहीं हैं क्योंकि सब का अहं प्रबल हो जाता है।

आपके नाम, पारिवारिक पृष्ठभूमि और उन मानवश्रेष्ठ के जरिए आपसे किये गए संवाद पर आपकी तात्कालिक प्रतिक्रिया जानने को मिली। आपका नाम जानने के बाद यह संभव हो गया कि अंतर्जाल के जरिए आपकी और भी कार्यवाहियों से परिचित हुआ जा सके। उनसे भी थोड़ा बहुत गुजरना हुआ। आपने कह ही दिया है इसलिए निश्चिंत रहा जा सकता है कि आप रूखेपन और प्रत्यक्षता को समझ सकते हैं, और इसे हमारी बेरूखी और ह्रदयहीनता नहीं समझेंगे। कि आप चीज़ों को समझने की प्रक्रियाओं में हैं। अतएव आपसे कुछ कठोर भी कहा जा सकता है, आप उसे अन्यथा नहीं लेंगे।

कुछ मनुष्य तुरंत प्रतिक्रियात्मक होते हैं, उतावले से। उनका दिमाग़ ऐसे अनुकूलन का अभ्यस्त होता है, जो तुरंत जवाबी प्रतिक्रिया देता है, और उसे अपनी तात्कालिकता के साथ तुरंत व्यक्त कर देता है। यह कोई ग़लत बात नहीं है, पर इससे यह परिलक्षित होता है कि उसमें धेर्य की कमी है, उसमें अच्छे श्रोता या पाठक होने की प्रवृत्ति नहीं है। वे चीज़ों के साथ अंतर्क्रिया करके उन्हें आत्मसात्कृत करने की बज़ाए उनसे सीधी लड़ाई छेड़ने को, सचेत और सतर्क हो उठते हैं।

ये ज्ञान को, चीज़ों को समझने की प्रक्रिया और पद्धति के लिए ज़्यादा अच्छे लक्षण नहीं हैं। तात्कालिक तुरंत प्रतिक्रियात्मकता, अंतर्विरोधों के साथ, उनसे सकारात्मक द्वंद और संघर्ष करके अपने को विकसित करने का ज़रिया बनाने की जगह, नकारात्मक प्रतिरोध यानि कि विरोधी से, मान्यताओं के विपरीत से जाते लगते विचारों के साथ एक सुरक्षात्मक, सतर्क व्यवहार के लिए प्रेरित करती है। और मनुष्य इस प्रक्रिया में उलझता जाता है, अपने को और रूढ़ बनाता जाता है।

हालांकि आप इसकी इन शुरुआती प्रवृत्तियों से आगे निकल चुके हैं, और बातों को समझने और सही से लगते को स्वीकारने की दिशा में काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं, पर इसे और विकसित करने की आवश्यकता है।

आपको आपकी कई उलझनों और बातों पर हम विस्तार से, हालांकि क्लिष्ट सांद्रता और कई गंभीर इशारों के साथ लिख ही चुके हैं। आपको भी उनसे उसी गंभीरता के साथ गुजरना चाहिए, गुजरते रहना चाहिए। कई सूत्र वाक्य वहां कहे गये ही थे। धेर्य के साथ समझने की कोशिश की जानी चाहिए, अपने यथार्थ को समझते और उसके साथ गुनते हुए। किन्हीं बातों पर यदि आवश्यकता महसूस करते हैं तो और भी खुलकर संवाद किया जा सकता है

थोड़ा सा प्रतिवाद, आपकी वाज़िब बात को ही आगे बढ़ाते हुए :

‘समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है, किसी भी क्रिया के लिए। यानि प्रदत्त क्षण में, या तात्कालिक संदर्भों में, आपके लक्ष्य क्या हैं, एकाधिक लक्ष्य होने की अवस्थाओं में प्राथमिकता पर क्या है, यह हमारी कार्यवाहियों को तय करते हैं, या यह कहें कि करने चाहिएं। समीक्षा में या आलोचना में भी ऐसा ही होना चाहिए।

जब यह लक्ष्य प्राथमिकता पर है कि सार्वजनिक रूप से विचार का खंड़न या मंड़न, दत्त परिस्थितियों में ज़्यादा आवश्यक हो गया है तो आपका कहा शत-प्रतिशत सही है। अब संभावित प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखना आवश्यक नहीं है।

पर यदि लक्ष्य आलोचना के साथ-साथ, समीक्षित विचार या उससे संबंधित व्यक्ति में, नकारात्मकता को उभारे बिना, उसे अपनी प्रस्तुति पर पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत करवाना हो, यानि उसके विकास की संभावनाओं को ज़िंदा रखना हो, तो स्वाभाविकतः समीक्षा को, उसकी भाषा को, आवश्यक रूप से संयत और संवाद के लिए प्रेरित करने वाली होना चाहिए।

और यदि लक्ष्य वैयक्तिक रूप से उसकी व्यक्तिगत चेतना में, समझ में सचमुच ही सकारात्मक हस्तक्षेप करना हो तो फिर हमारी क्रियाविधियां, भाषा, संवाद का स्तर, उसके ज्ञान और समझ के स्तर के अनुरूप ही रखना होगा, वरना बीच का अंतराल हमारे लक्ष्य को असंभव बना देगा। एक बार संवाद सेतु खत्म, तो हस्तक्षेप की सभी संभावनाएं ख़त्म।

और यह भी होता है कि, हमारा लक्ष्य इनमें से कु्छ भी ना हो, हम सिर्फ़ अपने को केन्द्र में रखकर, अपने हितों और संभावनाओं के पल्लवन के लाभार्थ यह कार्य कर रहे हों, अपने आपको स्थापित करने का लक्ष्य ही सिर्फ़ हमारे दिमाग़ में हो, तो फिर हम किसी भी तरह से, तर्क-कुतर्क करने को स्वतंत्र होते हैं। आप देख ही रहे होंगे, आजकल यही ज़्यादा हो रहा है।

आपकी एक और बात ‘लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे?’ पर भी उपरोक्त में ही कुछ इशारे हो गये हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

अल्पना वर्मा ने कहा…

नियमित पढती हूँ.ज्ञान बढ़ता है और किसी -किसी लेख को समझने में दिमाग की कसरत भी हो जाती है.
शुभकामनाएँ .

शेखचिल्ली का बाप ने कहा…

:)

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