शनिवार, 22 सितंबर 2012

प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण

आपने कहा था कि मैं अतिरिक्त सचेत होने लगता हूँ, तब असहजता आ जाती है और यह भी कहा था कि मैं अतिरिक्त ध्यान न दूँ। भला यह कैसे होगा? ध्यान कम जाय या न जाय, इसके लिए क्या करें?

ध्यान देना या नहीं देना, किसी चीज़ के प्रति सचेत होना या ना होना, उस चीज़ के प्रति आपके कन्सर्न्स, उसके प्रति आपके रवैये पर निर्भर करती है। यदि उसके साथ आपके कन्सर्न्स है, आप उसके प्रति लगाव या महत्त्वपूर्णता का रवैया रखते हैं तो आप कितनी भी कोशिशे कीजिए, आपका ध्यान उधर बरबस जाता ही रहेगा, आप उसके प्रति सचेत होते ही रहेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि चीज़ों के प्रति अपने कन्सर्न्स, अपने संबंधों को बदले बिना, उनके प्रति अपने रवैयों को बदले बिना उन पर ध्यान जाना या उनके प्रति सचेत होना ख़त्म किया नहीं जा सकता। बिना संबंधों और रवैयों को बदले किन्हीं चीज़ों से सिर्फ़ ध्यान हटाने की कोशिश करना एक आध्यात्मिक कोशिश करने की तरह है जो व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है। यह पलायन है, हल या निपटारा नहीं।

जैसे कि मान लीजिए हमें अपना मज़ाक उड़ाए जाने पर क्रोध आता है। क्रोध इसलिए आता है क्योंकि हम अपने अहम् को, अपनी इज्ज़त को, अपने आत्मसम्मान को बहुत ही अधिक महत्त्व देते हैं और किन्हीं भी परिस्थितियों में इनके साथ समझौता करने का रवैया नहीं रखते। इसलिए हम इस बात के प्रति बहुत सचेत रह सकते हैं कि इस पर कोई आंच नहीं आए। जरा भी कोई ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जिनसे हमारी इज्ज़त, अहम् और आत्मसम्मान पर कोई खतरा महसूस होता है हम असहज होने लगते हैं, थोड़ा अधिक होने पर हम क्रोध में आ जाते हैं और अगर स्थितियां ज़्यादा बिगड़ जाएं तो हमारा व्यवहार अधिक ही उग्र हो सकता है।

अब यदि हम अपनी इस आदत या क्रोध की प्रतिक्रिया को बदलना चाहते हैं। सामान्यतः किया यह जाता है कि हम ऐसी स्थितियों से बचने की कोशिश करने लगते हैं, ऐसी स्थितियां बनती लगने पर वहां से खिसक लेना चाहते हैं, कुछ हो भी जाए और हमें क्रोध आने भी लगे तो उस क्रोध से लड़ने लगते हैं, जबरन उस स्थान पर, उन लोगों पर आ रहे क्रोध को दबाने की कोशिश करते हैं। कुछ तरीकों के अनुसार कुछ लोग गिनती गिनने लग सकते हैं, गाना गुनगुनाने लग सकते हैं। तात्कालिक रूप से इस तरह के तरीक़े कारगर से लग सकते हैं, पर वास्तव में होते नहीं। क्योंकि यहां मूल कारण वहीं हैं, उसकी प्रतिक्रियास्वरूप पैदा हुआ क्रोध भी वहीं है, सिर्फ़ उसके तात्कालिक रूप से प्रदर्शन को स्थगित किया जा रहा है, हमारी बन चुकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को दबाया, उसका दमन किया जा रहा है। इससे और भी कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं, यह दबाया हुआ क्रोध और कहीं निकल सकता है।

इसके स्थायी हल वही हो सकते है जैसा कि ऊपर कहा गया था, हालांकि वह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है पर समाधान वही हैं। यानि हमें अपनी स्वभाव बन गई प्रवृत्तियों, कन्सर्न्स, हमारे रवैयों से आंतरिक लड़ाई करनी पड़ेगी। हमें समझना होगा कि इज्ज़त, अहम् और आत्मसम्मान क्या चीज़ होते हैं, इनकी हमारे जीवन और बाकी समाज और परिवेश के साथ अंतर्संबंधों में इनकी कितनी महत्त्वपूर्णता भूमिका होती है, समझनी चाहिए। हमें तुलना करना सीखना पड़ेगा कि कब आत्मसम्मान महत्त्वपूर्ण होता है और कब बाकी चीज़ें, मतलब सामने वाला व्यक्ति, उसके साथ हमारे संबंध। हमें भी यह भी समझना होगा कि क्या वास्तव में हमारा आत्मसम्मान एक छुईमुई की तरह है जिसे किसी का भी जरा सा स्पर्श मुरझा सकता है। क्या इसे अधिक लचीला और मजबूत नहीं होना चाहिए जिस पर छोटे-मोटे मज़ाक कोई असर ना डाल पाएं। यानि हमें हमारे आत्मसम्मान के प्रति हमारे कन्सर्न्स, संबंधों को समझना और बदलना होगा।

दूसरी बात हमें ऐसे हालात में अपने प्रतिक्रियात्मक रवैयों को भी समझना होगा। हमें देखना होगा कि हमारी प्रतिक्रियाएं किस-किस तरह की अनैच्छिक स्थितियों को पैदा कर देती है, हमें, हमारे व्यक्तित्व को किस तरह सबके सामने कमजोरी या मखौल का विषय बना सकती है, कैसे हमारी प्रतिक्रियाएं हमारे सामाजिक अस्तित्व से मेल नहीं खाती और हम एक गैरजिम्मेदाराना असामाजिक व्यवहार करने लग सकते हैं। हमें हमारे रवैयों को अधिक जिम्मेदार, अधिक सामाजिक बनाना सीखना होगा। यानि इन्हें भी समझना और बदलना होगा।

जब आत्मसम्मान के प्रति हमारे कन्सर्न्स और हमारे रवैये में धीरे-धीरे ही सही उचित बदलाव किये जाएंगे तभी यह संभव हो सकेगा कि प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा होने पर भी हमें वाकई में क्रोध ही नहीं आए, उन्हें हम सहजता से लेना सीख सकें, हमारे प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण करना सीख सकें। एक बेहतर मनुष्य बन सकें।

शायद अब आप समझ सकते हैं कि आपको जिन चीज़ों से तकलीफ़ पैदा होती है, जिनके प्रति आपमें सचेतनता पैदा होती है, असहजता आती है, उन चीज़ों के प्रति अपने संबंधों और रवैयों में बदलाव ही वैसी स्थितियां पैदा कर सकता है कि आपका उन पर ध्यान ही ना जाए।

जैसे कि, जब हमने अपने आपको इस बात के प्रति भली-भांति मुतमइन कर लिया है और इसको व्यवहार में उतार लिया है कि व्यक्ति का पहनावा उसके आंतरिक व्यक्तित्व का आइना नहीं होता और बाहरी प्रस्तुति कोई मायने नहीं रखती तो आपका ध्यान लोगों के पहनावे पर जाएगा ही नहीं कि किसने किस वक़्त क्या पहना था, आपने क्या पहना था। अब आप यदि आप मानते हैं कि इससे फर्क पड़ता है, आप भी इन्हीं चीज़ों के हिसाब से व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया करते हैं तो आप कितना भी कोशिश करलें, आपका ध्यान लोगों के पहनावों पर जाता ही रहेगा। 

यदि हमको लगता है कि हमारी असफलता, हमसे हुई कोई हरकत से हमारी छवि, जिसे कि हम बहुत महानता के साथ जोड चुके हैं, पर दाग लगा सकती हैं, हमको कमजोर साबित कर सकती है, हमारा मज़ाक उड़वा सकती है, तो जाहिर है ऐसी किसी भी सार्वजनिक क्रियाकलापों में, व्यवहार में उतरते वक़्त हम असहज होंगे ही, उससे बचने की कोशिश करेंगे, उससे डरेंगे। और ऐसा तब अधिक होने की संभावना होती है जब हमें अपनी इस महान छवि के प्रति अधिक आत्मविश्वास भी ना हो।

ओह इस पर काफ़ी लंबा लिख गये हैं। बहुत इशारे हो चुके हैं, आप बात को शायद समझ पाएं।

परीक्षा में लिखते समय कुछ घबड़ाहट का अनुभव हुआ।....उस समय के बाद बार-बार यह महसूस हुआ कि घबड़ाहट और हाथ में कम्पन होता है।....जैसे मान लीजिए मैं बीस छात्रों की कक्षा में पढ़ाने जाता हूँ, तो मुझे घबड़ाहट क्यों होनी चाहिए, चाहे वह किसी तरह की हो।

किसी भी परीक्षा का मतलब हमारी, हमारे व्यक्तित्व की जांच ही होती है, और यह हम भली भांति जानते ही हैं। ऐसे ही कई लोगों के बीच प्रस्तुत होना भी अप्रत्यक्ष रूप से यही ही है। हमारे भय, हमारी दुश्चिंताएं हमारे अवचेतन का हिस्सा बन जाती हैं, और अनुकूल परिस्थितियों के पैदा होते ही जाने-अनजाने ही हमको प्रभावित करती ही हैं। इसलिए यह होता ही है, हो सकता ही है।

ऊपर काफ़ी कुछ कहा ही जा चुका है।

लड़कियों से भी कुछ हद तक बात करने में घबड़ाहट होती है।....जैसे मुझे कह दिया जाय किसी कक्षा में मैं पढ़ाने जाऊँ जिसमें लड़कियाँ (शायद बच्चियाँ नहीं) हों, तो शायद परेशानी होने लगे।...

लड़कियों वाले मामले में भी ऊपर वाली बात तो रहती ही है, एक और मसला जुड जाता है, विपरीत लिंगी होने का। एक उम्र के बाद, परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं के दौरान, स्त्री और पुरुष की संकल्पनाएं आकार लेने लगती हैं। समझ में उनके बीच का अलगाव बढ़ता है, साथ ही उनकी एकता के रहस्यमयी साये भी कल्पना में गहराने लगते हैं। दोनों के बीच की अंतर्संबंधता कुछ समझ में आती है, कुछ घटाघोप बनाती है। फलस्वरूप विपरीत लिंगी के साथ झिझक और असहजता बढ़ने लगती है। और भी कई चीज़ें आती है जिन्हें आप भली भांति जानते ही हैं।

कई सारी मानसिक उलझनें, जो एकांतिक कल्पनालोक का हिस्सा होती हैं, एक दूसरे का सामना होते ही उभर आती हैं, चेतनता के केन्द्रीय ढ़ांचे में हावी हो जाती हैं और व्यक्ति असहज व्यवहार को अभिशप्त हो जाता है। लगभग सभी इस प्रक्रिया से गुजरते हैं, और अधिकतर इससे पार नहीं पा पाते। आजकल की शहरी संस्कृति में सहशिक्षा तथा और भी कई अन्य घटकों के कारण यह असहजता थोड़ी कम रहती है, या यूं भी कह सकते हैं इससे पार पाने और आगे बढ़ने के अधिक अवसर उपल्ब्ध होते जाते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut achcha likha hai..mujhe lagta hai ki jitna ham sabko apna samjhen..yani soul me prem ho ..ham galat disha me ja hi nahi sakte...aur yahin to tapsya hai ...

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