शनिवार, 8 सितंबर 2012

संवाद और संबोधन में समस्या

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



संवाद और संबोधन में समस्या


लोगों के सामने या भीड़ के सामने बोलने में थोड़ी घबड़ाहट, होंठ सूख जाते हैं कभी-कभी। पैरों में कम्पन और घबड़ाहट होती है(शायद थी)।....आखिर भय है तभी ऐसा है। क्यों है ऐसा? भयमुक्त होना भी एक लक्ष्य है। इस पर ध्यान दें। बताएँ ऐसा क्यों है और इसका समाधान क्या है?....मैं जितनी जल्दी प्रतिक्रिया लिखकर देता हूँ उतनी सामने नहीं देता। मैं बात करते समय तेजी से प्रतिक्रिया कम ही दे पाता हूँ। मुझे हमेशा जवाब देने के लिए थोड़ा समय चाहिए होता है।....हाँ तब जवाब देना बहुत आसान होता है जब सामनेवाला कोई ऐसी बात कहे जिसका जवाब मैं पहले से तय कर चुका हूँ यानि जानता रहता हूँ।....


होंठ सूखना, पैरों में कम्पन और घबड़ाहट ये सामान्य लक्षण हैं जो अक्सर ही व्यक्ति लोगों के सामने या भीड़ के सामने बोलने में महसूस करते हैं। खासकर शुरुआत में तो सभी ही करते हैं। दरअसल यह हमारे यहां कि सामान्य समस्या है चूंकि व्यक्ति की इस एकालापात्मक वाक् के विकास पर पर्याप्त ध्यान ही नहीं दिया जाता। यहां तक कि संवाद में भी कई लोग दिक्क़त महसूस करते हैं। संवाद की समस्या तो फिर भी उसकी व्यक्तिगत सक्रियता के चलते, उसकी आवश्यकताओं की तुष्टियों की जरूरतों के चलते काफ़ी कुछ ठीक हो जाती है, परंतु दूसरों व्यक्तियों को संबोधित करते हुए बोलना एक समस्या ही बना रहता है।

घरेलू परिवेश और विद्यालय का शुरुआती माहौल संवादमय नहीं है, इसलिए अक्सर जरूरी आत्मविश्वास पूरी तरह नहीं उभर पाता। कुछ ही निश्चित व्यक्तियों के सामने संवाद की प्रक्रिया सीमित हो जाती है। जब संवाद ही समुचित संभव नहीं है तो एकालाप यानि संबोधन आदि में, मंच आदि पर तो ऐसी हालत अवश्यंभावी है।

पर यह तो हो चुका, इसे सिर्फ़ समझने के लिए यहां रखा गया था, इसमें और भी कई घटक काम कर रहे होते हैं। खैर, अब बात आगे बढ़ने की है। इसलिए इसे अब के सापेक्ष और समझ लिया जाए।

एक वज़ह और है जिसके कारण इससे बाद में भी, यानि व्यक्तिगत परिपक्वता के बाद भी समस्या पैदा होती है। वह है विषयगत ज्ञान की कमी और भाषाई कमजोरी। परिचित मामलों में अपनी बात को ठीक तरह से भाषाई कसाव के साथ रखने में समस्या होती है, और अपने से अपरिचित मामलात सामने आते ही, विषयगत ज्ञान की कमी तथा भाषाई शव्दावली की कमी दोनों ही अखरने लगती हैं और इसी कारण संकोच व झिझक हमें चुप रहने की ओर प्रेरित करता है।

जिन विषयगत मामलों में हमारी दिलचस्पी भी होती है, थोड़ा बहुत सूचनाएं और उससे संबंधित ज्ञान भी हमने इकट्ठा किया होता है, वहां भी यदि समझ गहरी ना बन पाई हो तो हम तात्कालिक प्रतिक्रिया या संवाद करने में असहज होते हैं, हमारे दिमाग़ में कई अस्पष्ट विचार उमड़ घुमड रहे होते हैं, कई सारे विचार आ-जा रहे होते हैं। अब यदि मन में ही स्पष्ट वैचारिक स्थिरता नहीं हो तो, स्पष्ट है कि उनका संवाद में भाषाई निरूपण कैसे संभव हो सकता है। हम कुछ बोल नहीं पाते और बाद में अक्सर, जब फुर्सत में होते हैं और सोच-विचार को स्थिर कर पा रहे होते हैं, तब हमें बखूबी यह बूझ रहा होता है कि उस वक़्त यह कहा जा सकता था, उस वक़्त यह कहा जाना चाहिए था, आदि-आदि। पर इसमें चिंता की कोई बात नहीं होती, सभी इसी प्रक्रिया से गुजरते हैं, अपने विचारों को सापेक्षतः स्थिर करते हैं, और इसी तरह की कई स्थितियों से गुजर कर ही वैसी ही वैचारिक स्थिति उत्पन्न होने पर संवाद में अपनी सार्थक दखलअंदाजी दर्ज करने में सक्षम होते जाते हैं। अनुभव बढ़ता जाता है, अभ्यास होता जाता है और आत्मविश्वास तथा सटीकता बढ़ती जाती है।

यही बात आपने अपने शब्दों में कही है। यानि आप इस प्रक्रिया के उत्तरार्ध में है और जैसा कि आपने कहा है कि शीध्र ही आप इसमें अधिक सक्षम होते जाएंगे।

अब संबोधन वाली बात पर। ऊपर वाली बात यहां पर भी लागू होती है। यानि वैचारिक स्थिरता और भाषाई निरूपण की कमजोरी। और इसके साथ कई लोगों के सामने एकालाप करने यानि मंच की कमजोरी और जुड़कर इसे बहुगुणित कर देती है। और फलस्वरूप वे लक्षण उभरते हैं। मंच का फोबिया अक्सर व्यक्तियों पर हावी रहता है। हमारे परिवेश में ऐसे अवसर कम ही उपलब्ध होते हैं इसलिए इनका अभ्यस्त नहीं होना स्वाभाविक सा ही है। जब हम व्यक्तिगत रूप से संवाद करने में ही तकलीफ़ महसूस करते हों, वहां अकेले, बहुत से सारे लोगों के सामने बोलना, जो अपना सारा ध्यान आप पर ही केन्द्रित करके आप पर ही टकटकी लगाए बैठे हों तो उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरपाने यानि असफ़लता की संभावना की दिखती उपस्थिति पैर कंपकपा देती है, गला सुखा देती है, आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है।

कई माहिर वक्ता भी अपने अनुभव बांटते वक़्त यह बताते हैं कि मंच पर खड़े होते ही एकबारगी वे भी इन सभी लक्षणों से गुजरते हैं, पर उनका अभ्यास उन्हें इनसे पार पाना सिखा चुका है। वे थोड़ी देर में सामान्य हो जाते हैं और धाराप्रवाह में आ जाते हैं। यानि अभ्यास, यानि इस प्रक्रिया का बार-बार किया जाना जरूरी होता है और यह तभी हो सकता है कि आप बिना परिणामों और प्रस्तुति की चिंता किए बगैर यह करते रहें। धीरे-धीरे इन लक्षणों पर नियंत्रण स्थापित होता जाएगा। और बिना प्रस्तुति की चिंता किये बगैर यह किया जाना थोड़ा अव्यावहारिक सी बात है, तो स्पष्ट है कि हमें प्रस्तुति को बेहतर बनाना होगा, ताकि शुरुआती आत्मविश्वास पैदा किया जा सके। इसके लिए हमें पहले छोटे-छोटे विषयगत एकालापों की तैयारी करनी होगी।

हम जब किसी विषय पर बोलना चाहते हैं, तो एक साथ कई सारे विचार, जिनका कि उस विषय के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध है, हमारे दिमाग़ में उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। अगर हमने पहले से जितना भी संभव हो सका है, अच्छी तरह सोच-विचार कर अपनी मान्यताओं और उस विषय पर अपनी समझ को सापेक्षतः निश्चित किया हुआ होता है तो इस अस्थिरता का असर कम हो जाता है। इसलिए, बोलने से पहले तैयारी आवश्यक है। यह तैयारी कि आप अपनी बात को किन आयामों तक सीमित रखना चाहता है, ऐसे मुख्य बिंदु क्या हैं जिन्हें आप अवश्य पहुंचाना चाहते हैं, उन्हें लिखकर अपने पास रखा जा सकता है, उन बिंदुओं पर अपने विचार और समझ को नियत कीजिए कि आपको कितना कहना है, इसको समझाने के लिए आप क्या उदाहरण और दृष्टांत देने वाले हैं या देंगे उन्हें भी संदर्भित कर ले और उनके मुख्य बिंदु भी लिख लें। बस अब आपको अपनी इसी रूप रेखा के आधार पर बोलना है, और बस बोलना है।

मंच पर शुरुआत के अवश्यंभावी फोबिया के लक्षणों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ तरीका है कि पहले आप कुछ हल्की-फुल्की बाते करें, इसके लिए सामान्यतः वहां का तात्कालिक माहौल, श्रोताओं, ख़ुद और विषयगत संदर्भों पर भी कुछ चुटीली, व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की जा सकती हैं जो माहौल और आपके श्रोताओं और आपको भी सहज और एकाकार होने में मदद करती हैं। और फिर पूरी गंभीरता से शुरू हो जाएं, धीरे-धीरे बात को आगे बढ़ाएं। लहज़ा, संवेग आपकी बात को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

अगर आपसे पहले और भी वक्ता रहे हों, तो उनको ध्यान से सुना जाना चाहिए और कुछ मुख्य बिंदुओं को जिनपर सहमति दर्ज करनी हो ( इससे आपकी मिलती जुलती सामग्री को आप छोड सकते हैं, पहले वाले वक्ता का संदर्भ दे कर), और जिन पर आपको अपना प्रतिवाद दर्ज़ करना हो ( इस पर अपना अतिरिक्त प्रतिवाद रखकर अपनी सामग्री की कमी की भरपाई भी हो जाती है) , लिख लेना चाहिए। इनका अपने वक्तव्य में समावेश कीजिए।

यानि संबोधन के फोबिया से इससे लड़कर ही जीता जा सकता है, वैचारिक स्थिरता और भाषाई सुधार और विकास तथा अभ्यास के जरिए ही इसके लक्षणों के प्रभावों को कम किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

निर्झर'नीर ने कहा…

मै आपका नियमित पाठक हूँ आपके लेख बहुत ज्ञानवर्धक होते है ..ये साथ यूँ ही बना रहे ऐसी प्रभु से कामना करता हूँ

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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