शनिवार, 31 अगस्त 2013

आस्तिकता के सामाजिक-पारिस्थितिक पूर्वाधार

हे मानवश्रेष्ठों,

संवाद की इन्ही श्रृंखलाओं में, कुछ समय पहले एक गंभीर अध्येता मित्र से ‘ईश्वर की अवधारणा’ और इसकी व्यापक स्वीकार्यता के संदर्भ में एक संवाद स्थापित हुआ था। अब यहां कुछ समय तक उसी संवाद के कुछ संपादित अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



आस्तिकता के सामाजिक-पारिस्थितिक पूर्वाधार

एक सवाल जो मुझे अक्सर परेशान करता है वह यह है कि कैसे कोई अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को व सामने दिख रहे सबूतों को पूरी तरह नकार कर काल्पनिक अवधारणाओं को ही सच मान लेता है... और क्यों यह दोहरापन उसे परेशान नहीं करता...मिसाल के तौर पर एक मॉलीक्युलर बायोलॉजिस्ट लैब में तो डीएनऐ व आरएनऐ से छेड़छाड़ कर कई मामलों में एक नया जीव पैदा करने की सामर्थ्य रखता है, और अक्सर ऐसा करता भी है दूसरी तरफ वह यह भी दिल से मानता है कि सब कुछ 'ऊपरवाले' ने ऐसा ही बनाया जैसा आज दिख रहा है... जैव विकास हुआ ही नहीं...या एक पुरातत्वविद् और इतिहासवेत्ता जो अपने प्रोफेशनल अवतार में तो दुनिया को यह बताता-पढ़ाता है महज चंद हजार साल पहने आदमी पाषाण-कांस्य-लौह युग में था... पर साथ ही अपने धर्मग्रंथों पर भी अगाध विश्वास रखता है जो कई हजार ईश्वर के दूतों या लाखों साल चलने वाले युगों के बारे में बताते हैं...क्या यह भी दिमाग की सीमाओं के कारण होता है ?

इस पर हम कुछ इशारे उस ‘नास्तिकता और वैज्ञानिकता’ वाली पोस्ट में किए ही हैं। फिर भी लग रहा है कि शायद उन्हें पकड़ने और एक्सप्लोर करने में आपको कुछ आधारभूत समस्या आ रही है। चलिए कुछ गहराई में उतरने और आधारभूत रूप से समझने की कोशिश करते हैं।

हमारे परिवेश मे सामान्यतः अधिकतर व्यक्तित्व इन्हीं काल्पनिक अवधारणाओं के गहरे अनुकूलन के साथ बड़े होते हैं। उनका शारीरिक और मानसिक क्रिया-तंत्र, प्रतिक्रिया प्रणाली इनके प्राथमिक अनुकूलन में होती है। प्राथमिक अनुकूलन अत्यधिक प्रभावी होता है, क्योंकि यह मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र के न्यूरानों के साथ प्राथमिक रूप से एक निश्चित संबंध बनाता है. और आगे की अनुकूलन की कार्यवाहियां इन प्राथमिक प्रतिक्रिया संबंधों का प्रबलन ही करती चलती हैं। यानि कि व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया, प्राथमिक रूप से इन्हीं प्रबलित अनुकूलित संबंधों के आधार पर ही रूढ़ रूप से सामने आया करती है।

जैसे कि यदि नवजात बच्चा जब दिखती हुई चीज़ों के प्रति प्रतिक्रिया देने की कोशिश शुरू करता है, एक विशिष्ट उदाहरण लें, कोई वस्तु, जो उसके सामने लाई गई है, को देखकर उसमें दिलचस्पी जागती है और वह उसे पकड़ने की कोशिश करता है, ऐसे में इस तरह की सबसे पहली कोशिश में, जिसमें स्थितियों का संयोग भी है, मान लीजिए वस्तु बांये हाथ के करीब थी ( इसीलिए अक्सर वे बुजुर्ग जो इसके परिणामों से परिचित हैं, या इसे परंपरा का अंग मानते हैं, यह कहते हुए मिल जाएंगे कि अरे सीधे हाथ की तरफ़ से दिखाओ, सीधे हाथ की तरफ़ से पकड़ाओ), वह अपना बांया हाथ आगे बढ़ाता है और वस्तु को छूने-पकड़ने की कोशिश करता है, तो ऐसे में उसके तंत्रिका-तंत्र में सूचना-संकेतों की यह पूरी प्रक्रिया, न्यूरानों के एकरेखीय आबंधन के जरिए एक प्रतिवर्त ( reflex ) के रूप में दर्ज़ हो जाती है। यानि दूसरी बार, जब उसके सामने कोई वस्तु रखी जाएगी, तो यह प्रतिक्रिया का प्रतिवर्त काम करेगा और सहज रूप से ही बांया हाथ आगे बढ़ जाएगा। यदि ध्यान नहीं रखा जा रहा है तो सूचना-संकेत का यह आरेखन और अधिक प्रबलित होता जाएगा और एक आदत के रूप में व्यष्टि का विशिष्ट गुण बन जाएगा। यानि कि धीरे-धीरे बच्चे की अधिकतर क्रियाएं इस बाये हाथ के जरिए संपन्न होने लगेंगी, इसी हाथ का प्रयोग उसे सहज लगेगा, दक्षता इसी में सिमटती जाएगी और अंततः वयस्क उस बच्चे को बांये हाथ का, लेफ़्ट-हेंडी ( प्रकृति या ईश्वर :-) द्वारा प्रदत्त जन्मजात गुण ) मानकर सामान्य हो जाएंगे।

इसी तरह शारीरिक व्यवहार के, तंत्रिका-तंत्र में बहुत सारे प्रतिवर्त बना करते हैं जो व्यष्टि के शारीरिक प्रतिक्रिया प्रणाली को सुनिश्चित सा करते चलते हैं। जैसे कुछ निश्चित आकृतियां, आकारों को देखते ही जय-जय करने और हाथ जोड़ना, कुछ स्थलों को देखते ही सिर झुकाना, आदि। इस तरह ही अपने वयस्कों से सीखते हुए उनके कुछ निश्चित व्यवहारसंरूप भी बन जाया करते हैं जो वयस्कों की तरह ही उनकी भी दैनंदिनी का बिना सवाल का हिस्सा बनते जाते हैं। वे भी कृत्रिम रूप से इनकी आदत और सहजता का क्षेत्र बन जाते हैं। कई सारे और व्यवहार संरूपों की तरह ही, जैसे दिया-बाती करना, पूजा-अर्चना, ट्विंकल-ट्विंकल की तरह ही आरतियां सुनना-सुनाना, छाप- तिलक, त्यौहारी परंपराएं, शुभ-कार्यों के आरंभ संबंधी परंपराएं - नारियल फोड़ना - पूजा-स्थलों से शुरुआत करना - नई वस्तुओं की पूजा-अर्चना, घरों में पूजा के कोने, बाहरी परिवेश में पूजा-स्थलों पर आवागमन, बाहरी सक्रियता का धर्म के दायरे में ही परवान चढ़ना आदि-आदि। ये सब व्यष्टि के व्यवहार संरूपों, आदतों में इतने गहराई से पैबस्त हो जाता है वह इन्हीं में सहज महसूस करता है, इन्हें आवश्यक समझने लगता है, इनको बिना सवाल या नागा किए करते चले जाने में ही अपना भला समझता है, इनकी तार्किकी के बारे में कभी नहीं सोचता, इन्हें अपने अस्तित्व के साथ जोडकर देखने लगता है। इन सबके नहीं होने से उसे अपने अस्तित्व पर खतरा नज़र आने लगता है, जीवन से संबंधित एक असुरक्षाबोध घेरने लगता है।

मानसिक-वैचारिक क्रियातंत्र भी इन्हीं के आधारों पर और कुछ इसी तरह परवान चढ़ा करते हैं। आसपास के परिवेश और स्वयं व्यष्टि के अपने बारे में जानकारियों, ज्ञान के बारे में विज्ञान प्रदत्त समझ, तार्किकी, वास्तविकताएं तो उसके विकास-क्रम में बहुत बाद में, यानि कि जब वह विद्यालय में उच्च-प्राथमिक कक्षाओं ( छठी से ) में अध्ययन करता है। इससे पहले की कक्षाओं में भी शुरू हो जाता है, पर वह आधारभूत रूप से होता है और वह भी उसे जैसा है वैसा ही स्मृति का हिस्सा बना लेने और तार्किकी के बगैर होता है। इसका मतलब यह हुआ कि व्यष्टि की उम्र के, विकास के शुरुआती आठ-दस साल, अपने परिवेश में स्थित व्यक्तियों द्वारा प्रदत्त जानकारियों, समझ और तार्किकी पर आधारित हुआ करते हैं। ( यहां इस बहुप्रचारित बात को भी ध्यान में रख लिया जाए कि सामान्यतः मस्तिष्क के विकास के लिए शुरुआती पांच वर्ष बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं ) यानि कि उसकी भाषा, सीखी जा रही भाषा में अमूर्त चिंतन, चिंतन के विषय, विचारों की उत्पत्ति, उनकी अंतर्संबंधताएं, तार्किकी, अभिव्यक्ति, आदि-आदि परिवेश के वयस्कों पर निर्भर हुआ करती है। यही सब मिलकर उसके वैचारिक आधारों, चिंतन-प्रक्रिया के आधारभूत आदर्शों और आधारों, काल्पनिक-भ्रामिक ( जैसी भी परिवेश से मिल रही हैं, जहां परिवेश में तार्किक वयस्क हैं वहां थोड़े बेहतर आधार बनने की संभावनाएं हैं ही ) तार्किकियों की परिवेश द्वारा प्रदत्त उस आधारभूत वैचारिक ढाचे का निर्माण करते हैं जिसके अनुसार ही उसका चिंतन, विचार और तर्क श्रृंखलाएं आगे परवान चढ़ा करती हैं। यानि कि प्राथमिक रूप से वैचारिक और तार्किक प्रक्रिया का हुआ यह अनुकूलन उस मस्तिष्क विशेष के आधारभूत ढांचे के मूल में होता है जिसके दायरे में ही सोच-विचार करने और इसी के अनुरूप बने रहने में वह मानसिक रूप से अधिक सहज महसूस करता है। अब आप यह जानते ही है कि हमारे यहां का धार्मिक, आध्यात्मिक ( भाववादी-प्रत्ययवादी idealistic दृष्टिकोण आधारित ), ढोंगी, काल्पनिक, भ्रामिक, व्यक्तिवादी, लोलुप, लालची परिवेश किस तरह का ढांचा निर्मित करने को अभिशप्त है, इसी प्रक्रिया को आप संस्कारीकरण जैसा कह सकते हैं। यह उसके व्यक्तित्व का आधारभूत ढांचा होता है जो उसके वास्तविक और सामान्य व्यवहार को प्राथमिक रूप से निश्चित और निर्देशित कर रहा होता है। यानि समान परिस्थितियां पैदा होने पर उनका यह ढांचा ही, अपने इन्हीं अनुकूलित प्रतिवर्तों के अनुसार ही इसी तरह की प्राथमिक प्रतिक्रिया देने को अभिशप्त होता है। 

जैसा कि शिक्षा-प्रणाली सिर्फ़ जीवन की आर्थिकी से संबंधित है, सामान्यतः आगे की शिक्षा, बिना सोच-समझ का हिस्सा बने सिर्फ़ रटने, परीक्षाएं पास करके नौकरियों के लिए आधारभूत डिग्रियां प्राप्त करने के लिए सीमित होती है, और इस आधारभूत ढांचे में कोई विशिष्ट छेड़छाड़ नहीं हो पाती, यही उसका मूल बना रहता है। ऐसे में कुछ व्यक्ति जो वैज्ञानिक उच्च शिक्षा की सीढ़ीया चढ़ते हैं, जिनके लिए ज्ञान की तार्किकी में  उतरना उनके व्यवसाय से गहराई से संबंधित होता है, जिस ज्ञान की व्यवहारिक सफलता ( डॉक्टर, वैज्ञानिक क्षेत्रों से जुड़े व्यवसाय आदि जिनका कि जिक्र आपने किया है ) उस विषय से संबंधित विज्ञान और तार्किकी से जुड़ी और निर्भर होती है, वहां भी सामान्यतः यह होता है कि जीवन में विशिष्ट रूप से आई इस आवश्यकता से निपटने के विशिष्ट प्रयास किए जाते हैं, अपने आपको जीवन की सामान्यता से विलगित करके इसी पर केन्द्रित किया जाता है। यानि कि सामान्य जीवन, उसकी सभी अंतर्क्रियाओं से लगभग विलगित स्थितियों के बीच इस नई समझ और तार्किकी के परवान चढ़ने की प्रक्रिया चलती है और उसमें विशिष्ट रूप से प्रयास करके दक्षता हासिल करना प्राथमिक उद्देश्य बनता है ताकि उस विषय-विशेष से संबंधित केरियर में ऊंचे पायदान चढ़े जा सकें। इसके कारण अक्सर इस विशिष्ट तार्किकी का जीवन के साथ सामान्यीकरण संभव नहीं हो पाता। यह नया ज्ञान, नई समझ और तार्किकी जीवन से जुड़ी अन्य चीज़ों के साथ अंतर्संबंधित नहीं हो पातीं। इस विशिष्ट प्रयोजन के लिए उनके मस्तिष्क में जैसे एक अलग ही होना अनुकूलित हो जाता है। यूं भी कह सकते हैं, कि तार्किकी-विश्लेषण-वैज्ञानिक पद्धति आदि के लिए यह विशिष्ट व्यावसायिक प्रयोजन आरक्षित हो जाता है।

इस तरह वे इस विशिष्ट प्रयोजन के लिए इस नये अलग विकसित हुए ढांचे का प्रयोग करते हैं और सामान्य जीवन में, कई मान्यताओं-विश्वासों-आस्थाओं में, व्यवहारों में, आदर्शों में अपनी उसी प्राथमिक ढांचे के अनुसार कार्य करते रहते हैं, सहज रहते हैं। दोनों क्षेत्रों को आपस में घुलने मिलने की आवश्यकता और जरूरत ही पेश नहीं आती, और वे इन दोनों को अलग-अलग जी रहे होते हैं। कभी-कभी अंतर्विरोध या अंतर्द्वंद पैदा भी होते हैं तो इससे पैदा होने वाली असहजता और तकलीफ़ों से बचने के लिए वे इनका विलगन और बढ़ाते हैं। अपनी दोनों तरह की तार्किकताओं को, आपस में इस्तेमाल कर दोनों क्षेत्रों से संबंधित मान्यताओं को और पुष्ट करने में लगा देते हैं। वैज्ञानिक तार्किकता का प्रयोग, धार्मिकता के अनुकूलन को पुष्ट करने में, और धार्मिक-आध्यात्मिक तार्किकताओं का प्रयोग, वैज्ञानिक क्रियाकलापों के लक्ष्यों, रहस्यों और लूप-होल्स की जगह को भरने में लगा देते हैं।

तो कुलमिला कर बात कुछ इस तरह की ही हुआ करती है। अब आप चाहे तो इसे दिमाग़ की सीमाओं के कारण भी कह सकते हैं। क्योंकि दिमाग और तंत्रिकातंत्र के अनुकूलित प्रतिवर्त जब प्रबलित हो जाते हैं, स्थिर से हो जाते हैं तो उनमें परिवर्तन करके नये तरह के प्रतिवर्त बनाना एक मुश्किल और तंत्रिकातंत्र की बनावट की सीमाओं के कारण मुश्किल तो होता ही है, और समय गुजरते जाने पर तो कई चीज़ें असंभव सी भी होती जाती हैं। इसी तरह विचार की अमूर्तन तार्किकताओं के भी सहसंबध प्रबलित और स्थिर से होते जाते हैं। दिमाग़ उसी पद्धति से स्मृति और विश्लेषण की प्रक्रिया का उपयोग करना आसान और सहज पाता है जिसकी उसे आदत है।

या इसे महान विकासक्रम से प्राप्त दिमाग की असीम संभावनाओं का, अभिशप्त परिवेश द्वारा सीमित दायरे का अनुकूलन ( conditioning ) भी कह सकते हैं जो इन असीम संभावनाओं को सीमित, दमित करता है और परंपरा के दायरे से बाहर ही जाने नहीं देता। एक वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण ही निर्मित नहीं होने देता। व्यष्टि को इस व्यवस्था के मुफ़ीद बनाता है, गुलाम मानसिकताएं तैयार करता है जो कि बिना सवाल उठाए, प्रतिरोध किए अनुकरणीय भीड़ की जमात में शामिल हो जाए और प्रभु वर्ग उनका जैसा चाहे अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते रह सकें, और मज़ेदार बात साथ यह भी हो कि वे इसी में जीवन की सफलता, ख़ुशी और आनंद महसूस करें। अपनी स्थितियों के लिए कृतज्ञ महसूस करते रहें। उनकी और व्यवस्था के, तथा उनके दृष्टिकोण और तार्किकता के गुणगान गाते रहें, उसे और अधिक पुष्ट करते रहें।

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असली नास्तिकता भौतिकवादी ( materialistic ) दर्शन, द्वंदवादी विश्लेषण पद्धति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के ज़रिए ही उभर सकती है। फिर यह ईश्वर, अंधविश्वास और आस्थाओं के मामले भी द्वितीयक हो जाते है या अपना महत्त्व खो देते हैं। इन सबका मूलाधार ही ख़त्म हो जाता है, इनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है तो इन पर अलग से विचार करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। समझने और समझाने के लिए ही इन पर विचार किया जाता है। इनकी समाज में यथार्थता के भौतिक कारणों और आधारों का विवेचन किया जाता है।

गहरी बात, पर इस स्थिति तक भौतिकवादी ( materialistic ) दर्शन, द्वंदवादी विश्लेषण पद्धति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने/बरतने वाला कोई स्वयंमेव ही पहुंच जाता है या उसे प्रयास करने होते हैं यहाँ तक पहुंचने के लिये ?

भौतिकवादी दर्शन को आत्मसात करने की प्रक्रिया, वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करने और वैज्ञानिक-तार्किक पद्धतियों का इस्तेमाल करना सीखने की प्रक्रिया से गुजरकर ही कोई इस स्थिति तक पहुंच सकता है। इनसे संबंधित सामग्री सामान्यतः उपलब्ध नहीं हो पाती, अतएव सामग्री तक पहुंचने के लिए भी प्रयास करने होते हैं, इनको ह्र्दयंगम करने, अपने अनुभवजगत का हिस्सा बनाने और व्यवहार में ढालने के लिए तो विशिष्ट प्रयत्न करने ही होंगे।

अगर कोई भी इस प्रक्रिया का अंग है तो उसे ऐसा लग सकता है कि जैसे स्वयंमेव ही पहुंचा जा रहा है, परंतु वहां भी, और सामान्यीकरण करें तो कहीं भी, प्रयास करने से ही पहुंचा जा सकता है। और जाहिरा तौर पर, अपने परिवेशगत पारंपरिक अनुकूलनों से आगे निकलना है तो यह प्रयास काफ़ी कठिन और कष्टकर भी होते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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