रविवार, 10 अप्रैल 2011

लक्ष्य और धारण अवधि के अनुसार स्मृतियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति के भेदों पर विचार शुरू किया था, इस बार हम लक्ष्य और धारण अवधि के अनुसार स्मृति के भेदों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मृति
( involuntary and voluntary memory )

पिछली बार हमने स्मृति की जिन विशेषताओं की चर्चा की, वे सक्रियता के दौरान विकसित होती हैं और स्मृति का अभिन्न अंग बन जाती हैं। पैदा हो जाने के बाद वे अपने को सक्रियता से, उसके बदलते हुए अभिप्रेरकों, लक्ष्यों तथा प्रणालियों से स्वतंत्र रूप से भी व्यक्त कर सकती हैं। किंतु स्मृति का वर्गीकरण मनुष्य की तात्कालिक सक्रियता के विशिष्ट लक्षणों को ध्यान में रखकर भी किया जा सकता है। इस तरह सक्रियता के लक्ष्य के अनुसार हम अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मृतियों में भेद करते हैं।

अनैच्छिक स्मृति में कोई चीज़ याद कर लेने अथवा स्मृति से पुनर्प्रस्तुत करने के विशेष उद्देश्य का अभाव होता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य अपने लिए कोई सामग्री याद कर लेने का लक्ष्य नियत करता है, तो हम इसे ऐच्छिक स्मृति कहते हैं। ऐच्छिक स्मृति के मामले में याद करना और पुनर्प्रस्तुत करना विशेष स्मरण-क्रियाओं ( memorizing actions ) का रूप लेते हैं।

अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मृतियां स्मृति के विकास के दो क्रमिक चरण हैं। अपने अनुभव से अनैच्छिक स्मृति के महत्त्व को हर कोई जानता है। इस स्मृति के लिए किन्हीं इरादों या प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी हमारे अधिकांश अनुभव का आधार वही होती है। किंतु बहुत बार मनुष्य के सामने ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसमें उसे अपनी स्मृति का नियंत्रण करना पड़ता है। ऐसे मामलों में वह मुख्यतः अपनी ऐच्छिक स्मृति का सहारा लेता है, जो उसे आवश्यक सामग्री याद कर लेने या उसे पुनर्प्रस्तुत करने की संभावना देती है।

अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृति
( short-term and long-term memory )
संक्रियात्मक स्मृति

कोई भी सामग्री स्मृति में तभी धारण की जा सकती है, जब उसका कर्ता द्वारा समुचित संसाधन ( processing ) कर लिया गया हो। ऐसे संसाधन के लिए कुछ समय की आवश्यकता होती है, जिसे छाप स्थायीकरण काल ( imprint settling time ) कहा जाता है। आत्मपरक दृष्टि से यह प्रक्रिया अभी-अभी हुई घटना की गूंज के रूप में अनुभव की जाती है, मनुष्य एक क्षण तक वह देखना, सुनना, वग़ैरह जारी रखता है, जिसे दत्त क्षण में वास्तव में नहीं देख रहा या नही सुन रहा होता है ( ‘ वह अभी भी मेरी आखों के सामने थी’. ‘ उसकी आवाज़ अभी भी मेरे कानों में गूंज रही थी’, वग़ैरह )। ये प्रक्रियाएं अस्थिर तथा क्षणिक होती हैं, फिर भी वे इतनी विशिष्ट और अनुभव-संचय के क्रियातंत्रों में उनकी भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण होती है कि मनोविज्ञानी उन्हें सूचना के स्मरण, धारण तथा पुनर्प्रस्तुति का एक विशेष प्रकार कहते हैं, जिसे अल्पकालिक स्मृति ( short-term memory ) नाम दिया गया है।

दीर्घकालिक स्मृति ( long-term memory ) के विपरीत, जिसक विशेषता सामग्री को अनेक बार दोहराकर तथा पुनर्प्रस्तुत करके लंबे समय तक याद रखना है, अल्पकालिक स्मृति में सामग्री को उसके केवल एक बार क्षणिक प्रत्यक्षण ( perception ) के बाद बहुत कम समय के लिए याद रखा जाता है और लगभग कुछ ही क्षण बाद उसे पुनर्प्रस्तुत करके भुला दिया जाता है। कई बार ‘अल्पकालिक स्मृति’ शब्द के स्थान पर अन्य पर्यायों का प्रयोग भी किया जाता है, जैसे ‘क्षणिक स्मृति’, ‘प्राथमिक स्मृति’, ‘प्रत्यक्ष स्मृति’, वग़ैरह।

कभी-कभी कहीं ‘संक्रियात्मक स्मृति’ पद का प्रयोग भी किया जाता है, जिसमें अल्पकालिक स्मृति के कालगत स्वरूप के बज़ाए उसके ‘कामकाजी’ स्वरूप पर जोर दिया जाता है। परंतु आजकल मनोविज्ञान में इस पद ने एक भिन्न अर्थ ग्रहण कर लिया है। उसमें इसे उन स्मरण-प्रक्रियाओं को इंगित करने के लिए प्रयोग किया जाता है, जो मनुष्य के कार्यों और संक्रियाओं के निष्पादन में प्रत्यक्षतः सहायक बनती हैं।

जब हम कोई जटिल संक्रिया करते हैं, जैसे अंकगणित का सवाल, तो हम उसे अलग टुकड़ों में और क्रमशः पूरा करते हैं। ऐसा करते हुए हम कुछः अंतर्वर्ती परिणामों को तब तक अपने मस्तिष्क में धारण किये रहते हैं, जब तक हमें पुनः उनकी जरूरत होती रहती है। जैसे-जैसे हम अंतिम परिणाम की ओर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे प्रयोग की जा चुकी अनावश्यक हो चुकी सामग्री को त्याग, यानि भुला दिया जाता है। ऐसा ही पढ़ते, नक़ल करते या किसी भी अन्य कमोबेश जटिल काम को करते हुए भी होता है। व्यक्ति द्वारा प्रयोग किये हुए सामग्री के अंश अलग-अलग हो सकते हैं ( बच्चा इसी तरह अलग-अलग अक्षरों को जोड़कर ही पढ़ना सीखता है )।

ऐसे अंशों अथवा स्मृति की संक्रियात्मक इकाइयों की मात्रा का मनुष्य द्वारा इस या उस कार्य के निष्पादन पर प्रभाव पड़ता है। इष्टतम संक्रियात्मक इकाइयों के निर्माण को महत्त्व इसी कारण दिया जाता है। संक्रियात्मक स्मृति की ऐसी अवधारणा अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृति से भिन्न है, हालांकि उनमें कई सामान्य लक्षण अवश्य पाये जाते हैं। संक्रियात्मक स्मृति अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृतियों से प्राप्त सामग्री से एक ‘कार्यसाधक मिश्रण’ बनाती है। जब तक उससे काम चलता है, तब तक उसे संक्रियात्मक स्मृति के क्षेत्र में शामिल किया जाता है।

स्मृति के वर्गीकरण के लिए प्रयुक्त कसौटियां मनुष्य की सक्रियता, जो एक एकात्मक समष्टि ( unitary totality ) है, के विभिन्न पहलुओं को प्रतिबिंबित करती हैं। ऐसी ही एकात्मता, स्मृति के इन पहलुओं से संबंधित भेदों में भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए, किसी संकल्पना से संबंधित विचारों की स्मृति, वाचिक-तार्किक स्मृति होने के साथ-साथ ऐच्छिक या अनैच्छिक और अल्पकालिक या दीर्घकालिक स्मृति के रूप में भी वर्गीकृत की जा सकती है। ऐच्छिक और अनैच्छिक स्मृतियों के बीच भी जटिल सातत्य संबंध होते हैं। इसी तरह हम देखते हैं कि कोई भी चीज़ तब तक दीर्घकालिक स्मृति का अंग नहीं बन सकती, जब तक कि वह अल्पकालिक स्मृति से न गुज़र जाए, जो कि एक प्रवेश फ़िल्टर का काम करती है और स्मृति की सभी प्रक्रियाओं का समारंभ करवाती है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

स्मृति के भेद ( classification of memory )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति के शरीरक्रियात्मक और जीवरासायनिक सिद्धांतों पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति के भेदों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्मृति के भेद
( classification of memory )

स्मृति मनुष्य के जीवन तथा सक्रियता के सभी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इसलिए इसकी अभिव्यक्तियां भी अत्यंत बहुविध ( multifarious ) हैं। स्मृति का वर्गीकरण मुख्य रूप से सक्रियता की विशिष्टताओं पर आधारित होना चाहिए, जिसके दायरे में स्मरण तथा पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रियाएं घटती है। यह बात तब भी लागू होती है, जब स्मृति का कोई एक ही रूप ( उदाहरणार्थ, चाक्षुष-स्मृति अथवा श्रवण-स्मृति ) मनुष्य की मानसिक संरचना ( mental structure ) की विशेषता के तौर पर सामने आता है। वास्तव में मानसिक गुण पहले सक्रियता के दौरान जन्मता है और इसके बाद जाकर ही अपने को मानसिक संरचना में प्रकट करता है।

स्मृति के वर्गीकरण का सबसे सामान्य आधार उसकी विषेषताओं की मनुष्य की सक्रियता पर निर्भरता है, जिसके दौरान ही याद करने, याद रखने तथा पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं। आम तौर पर स्मृति के वर्गीकरण की तीन मुख्य कसौटियां हैं : १) मनुष्य की सक्रियता में प्रधान मानसिक क्रियाशीलता के स्वरूप के अनुसार, जब स्मृति को गत्यात्मक, संवेगात्मक, बिंबात्मक और शाब्दिक-तार्किक स्मृतियों में बांटा जाता है, २) मनुष्य की सक्रियता में निर्धारित लक्ष्यों के स्वरूप के अनुसार, जब स्मृति स्वैच्छिक और अनैच्छिक, इन दो प्रकार की होती है, ३) मनुष्य की सक्रियता के लिए आवश्यक सूचना के धारण की अवधि के अनुसार, स्मृति के तीन भेद बताए जाते हैं, अल्पकालिक, दीर्घकालिक और तात्कालिक

गत्यात्मक, संवेगात्मक, बिंबात्मक और शाब्दिक-तार्किक स्मृति

अलग-अलग प्रकार की सक्रियता में अलग-अलग ढंग की मानसिक क्रियाशीलता की प्रधानता होती है, जैसे पेशीय, संवेगात्मक और बौद्धिक। इनमें से हर प्रकार की क्रियाशीलता उससे संबंधित कार्यों और उनके उत्पादों - गतियां, संवेग, बिंब, विचार - में व्यक्त होती है। इनमें मदद करनेवाले स्मृति के विशिष्ट रूपों को मनोविज्ञान में गत्यात्मक, संवेगात्मक, बिंबात्मक और वाचिक-तार्किक स्मृतियां कहा जाता है।

गत्यात्मक स्मृति ( dynamic memory ) विभिन्न गतियों व उनकी श्रृंखलाओं को याद करने, याद रखने और पुनर्प्रस्तुत करने में व्यक्त होती है। बहुत से लोगों में इस प्रकार की स्मृति अन्य स्मृतियों से प्रबल होती है। इस प्रकार की स्मृति इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह विभिन्न व्यावहारिक तथा श्रम संबंधी आदतों और चलने, लिखने, आदि की आदतों के निर्माण का आधार प्रदान करती हैं। गत्यात्मक स्मृति के बिना हमें किसी भी क्रिया को करना बार-बार सीखना पड़ेगा। सामान्यतः हम अच्छी गत्यात्मक स्मृतिवाले मनुष्य को उसकी दक्षता, कौशल और साफ़ काम से पहचान सकते हैं।

संवेगात्मक स्मृति ( emotional memory ) संवेगों को याद रखने की क्षमता है। संवेग सदा हमारी आवश्यकताओं व रुचियों की तुष्टि की मात्रा का और परिवेश से हमारे संबंधों का संकेत देते हैं। अतः हर मनुष्य के जीवन तथा सक्रियता में संवेगात्मक स्मृति बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। एक बार अनुभव और याद कर लिए गये संवेग संकेत बन जाते हैं और हमें या तो कोई काम करने को प्रेरित करते हैं या ऐसी कोई चीज़ करने से रोकते हैं, जिसने पहले कभी अप्रिय संवेग जगाए थे। अन्य व्यक्ति से सहानुभूति रखने और किसी कलात्मक रचना के नायक के भावनाजगत में भागीदार बनने की योग्यता संवेगात्मक स्मृति पर ही आधारित होती है। एक अर्थ में संवेगात्मक स्मृति अन्य सभी स्मृतियों से प्रबल सिद्ध हो सकती है। हर कोई अनुभव से जानता है कि बहुत-सी घटनाएं, पुस्तकें और फ़िल्में उनके द्वारा मन पर डाली गई छापों और जो भावनाएं उन्होंने जगाई हैं, उनसे ही याद रखी जाती हैं। फिर भी इस तरह की छापें निश्चित वस्तुओं से असंबद्ध नहीं होती, वे साहचर्यों की लंबी श्रृंखला में पहली कड़ी हो सकती हैं।

बिंबात्मक स्मृति ( imagery memory ) परिकल्पनों ( अर्थात् प्रकृति और जीवन के दृश्यों ) और अलग-अलग ध्वनियों, गंधों तथा स्वादों को धारण करती हैं। यह चाक्षुष, श्रवणमूलक, स्पर्शमूलक, घ्राणमूलक और आस्वादमूलक हो सकती हैं। चाक्षुष और श्रवणमूलक स्मृतियों के विपरीत, जो आम तौर पर काफ़ी विकसित होती हैं और सभी सामान्य लोगों के जीवन में प्रमुख भूमिका अदा करती हैं, स्पर्श, घ्राण तथा आस्वाद से संबंधित स्मृतियों को एक तरह से पेशेवर गुण माना जा सकता है। इनके समवर्ती संवेदनों की भांति ये स्मृतियां भी मनुष्य की सक्रियता की विशिष्ट परिस्थितियों में ही सघन विकास करती हैं। उदाहरण के लिए, अंधों और बहरों के मामले में वे चाक्षुष और श्रवणमूलक स्मृतियों की कमी पूरी करते अथवा उनका स्थान लेते हुए विकास के आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच सकती हैं। बिंबात्मक स्मृति कलाओं से संबंधित पेशों के लोगों में विशेषतः विकसित होती है।

वाचिक-तार्किक स्मृति ( literal-logical memory ) विचारों से संबंध रखती है। इस स्मृति को शाब्दिक भी और तार्किक भी इसलिए कहा गया है कि विचारों का भाषा के बाहर अस्तित्व नहीं होता। चूंकि उन्हें विभिन्न भाषाई माध्यमों से व्यक्त किया जा सकता है, इसलिए उनकी पुनर्प्रस्तुति या तो केवल उनकी अंतर्वस्तु पर लक्षित होगी या उनके शाब्दिक ( वाचिक ) रूप पर। शाब्दिक रूप वाले मामले में यदि सामग्री का कोई शब्दार्थ-विश्लेषण नहीं किया जाता है, तो इसे शब्दशः याद किया जाना अपना तार्किक गुण खो देगा और मात्र एक यांत्रिक क्रिया बन कर रह जाएगा।

दूसरी संकेत पद्धति ( मानवीय भाषा ) की प्रधानतावाली वाचिक-तार्किक स्मृति केवक मनुष्यों की विशेषता है। जहां तक गत्यात्मक, संवेगात्मक और बिंबात्मक स्मृतियों का प्रश्न है, तो अपने सरलतम रूपों में वे पशुओं में भी मिलती हैं। दूसरी स्मृतियों के विकास पर आधारित होकर, वाचिक-तार्किक स्मृति उनके संबंध में प्रधान बन जाती है और स्मृति के अन्य रूप सभी रूपों का विकास उसपर निर्भर होता है। वाचिक-तार्किक स्मृति शिक्षण की प्रक्रिया में छात्रों द्वारा ज्ञान के आत्मसात्करण में प्रमुख भूमिका निभाती है।



अगली बार स्मृति के अन्य भेदों पर चर्चा जारी रखेंगे।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 26 मार्च 2011

स्मृति के शरीरक्रियात्मक और जीवरासायनिक सिद्धांत

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति के शरीरक्रियात्मक और जीवरासायनिक सिद्धांतों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्मृति के शरीरक्रियात्मक सिद्धांत
( physiological principles of memory )

स्मृति क्रियातंत्रों के शरीरक्रियात्मक सिद्धांत उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के नियमों से संबंधित सिद्धांत की मूल प्रस्थापनाओं से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। अनुकूलित ( conditioned ) कालिक संबंधों के निर्माण का सिद्धांत मनुष्य के वैयक्तिक अनुभव के निर्माण का, यानि ‘शरीरक्रियात्मक स्तर पर स्मरण’ की प्रक्रिया का सिद्धांत है। वास्तव में अनुकूलित प्रतिवर्त ( conditioned reflex ), नयी तथा पहले से विद्यमान अंतर्वस्तु के बीच संबंध स्थापित करने की क्रिया होने के कारण, स्मरण की क्रिया के शरीरक्रियात्मक आधार का ही काम करता है।

इस क्रिया के कार्य-कारण संबंध को समझने के लिए प्रबलन ( reinforcement ) की अवधारणा अत्यधिक महत्त्व रखती है। अपने शुद्ध रूप में प्रबलन, मनुष्य द्वारा अपने कार्य के प्रत्यक्ष लक्ष्य को पाना ही है। अन्य मामलों में यह एक उद्दीपक है, जो क्रिया को किसी निश्चित दिशा में अभिप्रेरित अथवा संशोधित करता है। प्रबलन क्रिया के उद्देश्य के साथ नवनिर्मित संबंध के संयोग ( combination ) का परिणाम होता है, ज्यों ही संबंध का लक्ष्य की प्राप्ति के साथ संयोग हो जाता है, वह सुस्थिर और दृढ़ बन जाता है। मनुष्य की क्रियाशीलता के नियमन में, प्रतिवर्त वलय के बंद होने में प्रबलन बुनियादी महत्त्व रखता है।

अपने जीवनावश्यक प्रकार्य की दृष्टि से स्मृति विगत की बजाय भविष्य की ओर लक्षित है। विगत की स्मृति की व्यर्थ होगी, यदि उसे भविष्य में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सफल कार्यों के परिणामों का संचयन ( accumulation ), भावी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उनकी उपयोगिता का प्रसंभाव्यतामूलक पूर्वानुमान ( potential-oriented prediction ) है।

इन्हीं सिद्धांतों से ही घनिष्ठतः जुड़ा हुआ स्मृति का भौतिक सिद्धांत है। इसे यह नाम इसके प्रतिपादकों के इस दावे के कारण दिया गया है कि न्यूरानों के किसी निश्चित समूह से गुजरते हुए तंत्रिका-आवेग अपने पीछे साइनेप्सों ( न्यूरानों के संधिस्थलों ) के वैद्युत एवं यांत्रिक परिवर्तनों के रूप में एक भौतिक छाप छोड़ जाता है। ये परिवर्तन, आवेग का अपने पूर्वनिर्धारित पथ से गुज़रना आसान बना देते हैं।

वैज्ञानिकों का विश्वास है कि किसी भी वस्तु के परावर्तन के साथ, उदाहरण के लिए, चाक्षुष प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में आंख द्वारा उस वस्तु की रूपरेखा अंकित किये जाने के साथ, न्यूरानों के एक निश्चित समूह के बीच से तंत्रिका-आवेग गुज़रता है, जो जैसे कि प्रत्यक्ष का विषय बनी हुई वस्तु का मॉडल बनाते हुए न्यूरानों की संरचना में एक स्थिर देशिक तथा कालिक छाप छोड़ जाता है ( इसीलिए भौतिक सिद्धांत को कभी-कभी न्यूरान मॉडलों का सिद्धांत भी कहा जाता है)। इस सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार न्यूरान मॉडलों का निर्माण तथा बाद में उनका सक्रियीकरण ही याद करने, रखने और पुनर्प्रस्तुत करने का क्रियातंत्र है।

स्मृति के जीवरासायनिक सिद्धांत
( biochemical principles of memory)

स्मृति के क्रियातंत्रों के अध्ययन का तंत्रिकाक्रियात्मक स्तर वर्तमान काल में जीवरासायनिक ( biochemical ) स्तर के अधिकाधिक निकट आता जा रहा है और कई बार तो उससे एकाकार भी हो जाता है। इसकी पुष्टि इन दो क्षेत्रों के संधिस्थल पर किये गए अनुसंधानों से होती है। इन अनुसंधानों के आधार पर, मिसाल के लिए, यह प्राक्कल्पना प्रतिपादित की गई है कि स्मरण की प्रक्रिया दो चरणों में संपन्न होती है। पहले चरण में मस्तिष्क में क्षोभक की क्रिया के तुरंत बाद घटनेवाली एक अल्पकालिक विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया न्यूरानों में प्रत्यावर्तनीय ( repatriable ) शरीरक्रियात्मक ( physiological ) परिवर्तन पैदा करती है। दूसरा चरण, जो पहले चरण के आधार पर पैदा होता है, स्वयं जीवरासायनिक अभिक्रिया ( biochemical reaction )  का चरण, जिसके फलस्वरूप नये प्रोटीन बनते हैं। पहला चरण कुछ सैकंड या मिनट जारी रहता है और अल्पकालिक ( short-term ) स्मरण का शरीरक्रियात्मक क्रियातंत्र माना जाता है। दूसरा चरण न्यूरानों में अप्रत्यावर्तनीय रासायनिक परिवर्तन लाता है और दीर्घकालिक ( long-term ) स्मृति का क्रियातंत्र माना जाता है।

यदि प्रयोगाधीन जीव को कुछ करना ( या न करना ) सिखाया जाए और फिर अल्पकालिक विद्युतरासायनिक अभिक्रिया को उसके जीवरासायनिक अभिक्रिया में बदलने से पहले कुछ क्षण के लिए रोक दिया जाए, तो उसे याद नहीं रहेगा कि उसे क्या सिखाया गया था।

एक प्रयोग में चूहे को फ़र्श से थोड़ा ही ऊंचे चबूतरे पर रख गया। चूहा कूदकर तुरंत नीचे आ जाता था। किंतु ऐसी एक कूद के दौरान बिजली के धक्के से पीड़ा अनुभव करके चूहा इस प्रयोग के २४ घंटे बाद भी चबूतरे पर रखे जाने पर ख़ुद नीचे नहीं कूदा और अपने वहां से हटाए जाने का इंतज़ार करता रहा। दूसरे चूहे के मामले में अल्पकालिक स्मृति को बिजली के धक्के के तुरंत बाद अवरुद्ध कर दिया गया। नतीजे के तौर पर अगले रोज़ उस चूहे ने यों बर्ताव किया कि जैसे कुछ हुआ ही न हो।

विदित है कि मनुष्य भी यदि थोड़े समय के लिए चेतना खो बैठता है, तो वह इससे तुरंत पहले की सभी घटनाओं को भूल जाता है। बहुत करके स्मृति से बाह्य प्रभाव की वे छापें विलुप्त होती हैं जिन्हें संबद्ध जीवरासायनिक परिवर्तनों के शुरू होने से पहले अल्पकालिक विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया में व्यवधान के कारण अपने स्थायीकरण के लिए समय नहीं मिल पाया था।

स्मृति के रासायनिक सिद्धांतों के पक्षधरों का कहना है कि छापों का स्थायीकरण, धारण और पुनर्प्रस्तुति बाह्य क्षोभकों के प्रभाव के कारण न्यूरानों में आनेवाले रासायनिक परिवर्तन, न्यूरानों के प्रोटीनी अणुओं, विशेषतः तथाकथित न्यूक्लीकृत अम्ल के अणुओं के विभिन्न पुनर्समूहनों ( re-grouping ) के रूप में व्यक्त होते हैं। डीएनए ( डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल ) को आनुवंशिक ( genetic ) स्मृति का वाहक माना जाता है और आरएनए ( राइबोन्यूक्लिक अम्ल ) को व्यक्तिवृत्तीय, वैयक्तिक ( individual ) स्मृति का आधार। प्रयोगों ने दिखाया है कि न्यूरान के क्षोभन से उसमें आरएनए की मात्रा बढ़ जाती है और स्थायी जीवरासायनिक चिह्न छूट जाते हैं, जिससे न्यूरान परिचित क्षोभकों की बारंबार क्रिया के उत्तर में सस्पंदन करने में समर्थ हो जाते हैं।

नवीनतम अनुसंधानों, विशेषतः जीवरासायनिक अनुसंधानों के परिणामों से भविष्य में मानव स्मृति के नियंत्रण की संभावना के बारे में आशाएं बंधी हैं। किंतु उन्होंने बहुर सारे मिथ्या और कभी-कभी तो बेसिर-पैर विचारों को भी जन्म दिया है, जैसे यह कि तब तंत्रिका-तंत्र पर प्रत्यक्ष रासायनिक प्रभाव डालकर लोगों को सिखाना, विशेष स्मृतिपोषक गोलियों के ज़रिये ज्ञान अंतरित करना, आदि संभव हो जाएंगे।

इस संबंध में उल्लेखनीय है कि यद्यपि मनुष्य की स्मृति-प्रक्रियाओं में सभी स्तरों पर तंत्रिका-संरचनाओं की अत्यंत जटिल अन्योन्यक्रिया शामिल है, फिर भी उनका निर्धारण ‘ऊपर से’, यानि मनुष्य की सक्रियता द्वारा होता है और उनके कार्य का सिद्धांत ‘समष्टि से अंशों की ओर’ है। इस सिद्धांत के अनुसार बाह्य प्रभावों की छापों का साकारीकरण शरीर-अंग-कोशिका दिशा में होता है, न कि इसके विपरीत दिशा में। स्मृति के कोई भी भैषजिक ( pharmaceutical ) उत्प्रेरक इस बुनियादी तथ्य को नहीं बदल सकते। रासायनिक क्रियातंत्र आनुषंगिक ( commensurate ) तथा सक्रियता का व्युत्पाद ( derivative ) होते हैं, इसलिए मस्तिष्क में तैयारशुदा रासायनिक द्रव्य सीधे पहुंचाकर नहीं बनाये जा सकते।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति की संकल्पना पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत
( psychological theories of memory )

स्मृति विषयक अध्ययनों का मनोवैज्ञानिक स्तर कालक्रम की दृष्टि से सबसे पुराना है और सबसे अधिक प्रवृत्तियां व सिद्धांत इसी स्तर से संबंध रखते हैं। उनके वर्गीकरण तथा मूल्यांकन का एक आधार यह हो सकता है कि वे स्मृति की प्रक्रियाओं के निर्माण में मनुष्य की क्रियाशीलता की क्या भूमिका मानते हैं और क्रियाशीलता की प्रकृति की क्या व्याख्या करते हैं। स्मृति विषयक अधिकांश मनोवैज्ञानिक सिद्धांत या तो केवल विषय ( स्मृति की वस्तु, सामग्री ) पर ध्यान केन्द्रित करते हैं या फिर केवल कर्ता ( चेतना की ‘शुद्ध’ क्रियाशीलता ) पर, और कर्ता तथा वस्तु की अन्योन्यक्रिया ( interaction ) के अर्थगत क्षेत्र को, मनुष्य की सक्रियता को अनदेखा कर डालते हैं। इस कारण इन सभी सिद्धांतों को एकांगी ( unilateral ) कहा जा सकता है।

स्मृति विषयक मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों में सबसे पहले वे सिद्धांत आते हैं, जिनका संबंध साहचर्यवाद से है। इनकी मुख्य प्रस्थापना यह है कि साहचर्य ( association ) अथवा मानसिक संबंध सभी मानसिक निर्मितियों का एक आवश्यक मूलतत्व है। इसके अनुसार यदि चेतना में निश्चित मानसिक निर्मितियां एक साथ अथवा एक के बाद एक करके पैदा हुई हैं, तो उनके बीच एक साहचर्यात्मक संबंध ( associative relationship ) बन जाता है, जिससे कि इस श्रृंखला की किसी भी कड़ी का पुनर्प्रकटन ( re-appearance ) चेतना में अनिवार्यतः अन्य सभी कड़ियों का परिकल्पन उपस्थित कर देता है।

इस प्रकार साहचर्यवाद के अनुसार चेतना में दो छापों की उत्पत्ति की एककालिकता ( simultaneity ) उनके बीच संबंध के निर्माण के लिए आवश्यक तथा पर्याप्त आधार है। यह प्रस्थापना इसके पक्षधरों को याद करने के क्रियातंत्रों का गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता से मुक्त कर देती थी, इसलिए वे अपने को ‘एककालिक छापों’ की उत्पत्ति के लिए जरूरी बाह्य परिस्थितियों के वर्णन तक सीमित रख सकते थे। उन्होंने इन परिस्थितियों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा:  (क) संबंधित वस्तुओं की देशिक तथा कालिक परस्पर-संलग्नता, (ख) उनकी समानता और (ग) उनका भेद अथवा विलोमता। इन्हीं तीन प्रभेदों के आधार पर उन्होंने साहचर्य के तीन रूप बताए: संलग्नतामूलक साहचर्य, साम्यमूलक साहचर्य और विरोधमूलक साहचर्य। इन तीन शीर्षों के अंतर्गत ही साहचर्यवादियों ने खींच-तानकर सभी प्रकार के संबंध शामिल कर दिये, जिनमें कार्य-कारण संबंध भी आते हैं। उनका कहना था कि कार्य और कारण आपस में हमेशा कालगत संबंध से जुडे होते हैं ( एतद्‍कारण, अतः एतद्‍ उपरांत ), इसलिए उन्होंने कार्य-कारण साहचर्यों को संलग्नतामूलक साहचर्यों की श्रेणी में रखा।

साहचर्य की धारणा की आगे चलकर एक नयी, अधिक गहन व्याख्या की गई। याद करना व याद रखना वास्तव में नये को मनुष्य के अनुभव में पहले से विद्यमान पुराने से जोड़ना है। यह जोड़ने की क्रिया तब स्पष्टतः दिखायी देती है, जब हम एक-एक चीज़ करके स्मृति की अगली प्रक्रिया, किसी सामग्री की पुनर्प्रस्तुति, को साकार बनाने में सफलता पाते हैं। हम किसी चीज़ को, उदाहरण के लिए, गांठ लगाकर रखने वाला तरीक़ा इस्तेमाल करके कैसे याद करते हैं? गांठ देखते ही हमें वह स्थिति याद आ जाती है, जिसमें हमने उसे बांधा था, स्थिति हमें याद दिलाती है कि हम किससे क्या बात कर रहे थे और इस तरह अंत में हमें याद आ जाता है कि हमने क्या याद करने के लिए यह गांठ बांधी थी। किंतु अगर ऐसी साहचर्य-श्रृंखलाओं का निर्माण परिघटनाओं ( phenomena ) की देशिक तथा कालिक संलग्नता ( involvement ) पर ही निर्भर हो, तो एक ही स्थिति अलग-अलग व्यक्तियों में एक ही जैसे साहचर्य जागृत करेगी। वास्तव में साहचर्य चयनात्मकतः ( selectively ) पैदा होते हैं और साहचर्यात्मक मनोविज्ञान ( associative psychology ) के प्रतिपादकों ने इस चयनात्मकता ( selectivity ) के निर्धारी कारक ( determining factors ) नहीं बताए। सच तो यह है कि वे तथ्यों का उल्लेख भर करने से आगे नहीं जा सके थे और इन तथ्यों की वैज्ञानिक व्याख्या बहुत बाद में जाकर ही की गई।

साहचर्यवाद के आलोचनात्मक विश्लेषण ( critical analysis ) ने मनोविज्ञान में स्मृति विषयक कई नये सिद्धांतों व संकल्पनाओं ( concepts ) के लिए आधार प्रदान किया। उनकी सारवस्तु काफ़ी हद तक इससे निर्धारित होती है कि उन्होंने साहचर्यात्मक मनोविज्ञान की किस बात को अपनी आलोचना का विषय बनाया था और स्वयं साहचर्य की अवधारणा के प्रति उनका क्या रवैया ( attitude ) है।

साहचर्यवाद के विरुद्ध सबसे कड़ा रवैया गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के प्रतिपादकों ने अपनाया ( जर्मन शब्द ‘गेस्टाल्ट’ का अर्थ है ‘बिंब’, ‘आकृति’, ‘नमूना’ )। यह सिद्धांत प्रत्यक्ष ( perception ) की जा रही संरचना ( structure ) को उसके अलग-अलग तत्वों ( elements ) की समष्टि नहीं, अपितु एक अविभाज्य ( integral ) संरचना मानता है। गेस्टाल्ट मनोविज्ञानियों ने साहचर्यात्मक मनोविज्ञान के घटकमूलक उपागम ( approach ) का विरोध किया और उसके मुकाबले में संश्लेषण ( synthesis ) का सिद्धांत, अंशों की तुलना में समग्र की आद्यता ( permittivity ) का सिद्धांत रखा। इसके अनुसार सामग्री का ढांचा आधार ( base ) है और मस्तिष्क में चिह्न की इससे मिलती-जुलती संरचना इसका व्युत्पाद ( derivative ) है ( समाकृति या संरचनात्मक समानता का सिद्धांत )।

बेशक सामग्री का एक निश्चित ढांचा याद करने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किंतु स्वयं ढांचा अपने में मनुष्य की सक्रियता के कार्य के अलावा कुछ नहीं है। गेस्टाल्ट मनोविज्ञानी समग्रता को आद्य और अंतिम तत्व घोषित करते हैं और गेस्टाल्ट के नियमों को, जैसा कि हमने साहचर्य के नियमों के मामले में भी देखा था, मनुष्य की सक्रियता से बाहर तथा स्वतंत्र मानते हैं। प्रणालीतांत्रिक दृष्टि से गेस्टाल्ट और साहचर्यात्मक मनोविज्ञान एक ही कोटि में आते हैं।

मानव चेतना को एक निष्क्रिय तत्व माननेवाले साहचर्यवाद और अन्य सिद्धांतों के विपरीत मनोविज्ञान की बहुत-सी प्रवृत्तियों ने स्मृति से संबंधित प्रक्रियाओं में चेतना की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया और स्मरण तथा पुनर्प्रस्तुति में ध्यान, अभिप्राय ( intention ) तथा समझ के महत्त्व पर ज़ोर दिया। किंतु इन सिद्धांतों में भी स्मृति-प्रक्रियाएं वास्तव में मनुष्य की सक्रियता से असंबद्ध थी और इसीलिए उनकी ग़लत व्याख्या की गई थी। उदाहरण के लिए, अभिप्राय को मात्र एक इच्छामूलक प्रयास अथवा चेतना की ऐसी ‘शुद्ध’ क्रियाशीलता माना गया था, जो स्मरण तथा पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रियाओं में कोई परिवर्तन नहीं लाती।

हाल के वर्षों में उस सिद्धांत को विशेष मान्यता प्राप्त हुई है, जो मनुष्य की सक्रियता को स्मृति समेत सभी मानसिक प्रक्रियाओं के जन्म व विकास का निर्धारी कारक मानता है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी सामग्री को याद करने, याद रखने और पुनर्प्रस्तुत करने की प्रक्रियाएं मनुष्य की सक्रियता के लिए उस सामग्री के महत्त्व पर निर्भर होती हैं।

प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि स्मृति में सर्वाधिक फलप्रद संबंध उन मामलों में बनते हैं, जब ऐसी सामग्री क्रिया के उद्देश्य से घनिष्ठतः जुड़ी होती हैं। ऐसे संबंधों के लक्षण, यानि उनकी दृढ़ता और अस्थिरता मनुष्य की आगे की सक्रियता में संबंधित सामग्री की सहभागिता ( participation ) की मात्रा पर और निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के दृष्टिकोण से इन संबंधों के महत्त्व ( importance ) पर निर्भर होती है।

इस तरह पूर्वचर्चित सिद्धांतों की तुलना में इस सिद्धांत की मुख्य प्रस्थापना को यों सूत्रबद्ध किया जा सकता है : विभिन्न परिकल्पनों के बीच संबंधों का निर्माण याद की जा रही सामग्री से अधिक इसपर निर्भर होता है कि स्मरणकर्ता इस सामग्री का क्या करता है



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 12 मार्च 2011

स्मृति की संकल्पना ( the concept of memory )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति की संकल्पना पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्मृति की संकल्पना
( the concept of memory )

मन की एक मुख्य विशेषता यह है कि मनुष्य द्वारा बाह्य प्रभावों के प्रतिबिंब को लगातार अपने आगे के व्यवहार में इस्तेमाल किया जाता है। व्यवहार की बढ़ती हुई जटिलता का एक कारण मनुष्य के अनुभव का बढ़ना है। यदि प्रांतस्था ( cortex ) में पैदा होने वाले परिवेश के बिंब अपने पीछे कोई भी निशान छोड़े बिना लुप्त होते रहते, तो अनुभव का संचय ( accumulation of experiences ) असंभव हो जाता। आपस में विभिन्न संबंध बनाते हुए ये बिंब दीर्घ समय तक सुरक्षित रहते हैं और जीवन तथा सक्रियता की आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्प्रस्तुत किये जाते हैं।

मनुष्य द्वारा अपने अनुभव को याद करने, याद रखने तथा बाद में पुनर्प्रस्तुत करने को स्मृति ( memory ) कहते हैं। इसमें चार मुख्य प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं : स्मरण ( याद करना ), स्मृति में धारण ( याद रखना ), पुनर्प्रस्तुति तथा विस्मरण ( भूल जाना )। ये मन की स्वतंत्र क्षमताएं नहीं है। उनका निर्माण सक्रियता के दौरान होता है और उनसे ही वे निर्धारित भी होती हैं। मनुष्य द्वारा किसी नई सामग्री का स्मरण उसकी जीवनावश्यक सक्रियता के दौरान व्यक्तिगत अनुभव के संचय से जुड़ा होता है। याद किये हुए को बाद में सक्रियता में इस्तेमाल करने के लिए उसकी पुनर्प्रस्तुति की आवश्यकता होती है। यदि कोई सामग्री सक्रियता से बाहर रहती है, तो वह भूल जाती है। सामग्री को याद रखना, अर्थात स्मृति में धारण करना सक्रियता में भाग लेने पर निर्भर होता है. क्योंकि मनुष्य का व्यवहार हर दत्त क्षण में उसके समस्त जीवनानुभव से निर्धारित होता है।

इस तरह स्मृति मनुष्य के मानसिक जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण तथा निश्चायक ( conclusive ) लाक्षणिकता है। स्मृति की भूमिका को विगत के बिंबों के निर्माण के समानार्थी नहीं माना जा सकता ( मनोविज्ञान में ऐसे बिंबों को परिकल्पन कहा जाता है )। स्मृति की प्रक्रियाओं के बाहर कोई भी क्रिया संभव नहीं है, क्योंकि साधारण से साधारण मानसिक क्रिया के लिए भी उसके हर वर्तमान तत्व को बाद के तत्वों से ‘संबद्ध’ ( relate ) करने के लिए याद रखे रहना अत्यावश्यक होता है। ऐसी ‘संबद्धता’ के क्षमता के बिना कोई भी विकास नहीं किया जा सकता। यदि मनुष्य में ऐसी क्षमता न हो, तो वह सदा एक नवजात शिशु जैसा बना रहेगा।

सभी मानसिक प्रक्रियाओं की सबसे महत्त्वपूर्ण लाक्षणिकता होने के कारण स्मृति मनुष्य के व्यक्तित्व की एकता व अविभाज्यता ( unity and indivisibility ) को सुनिश्चित करती है।

स्मृति को सभी मनोविज्ञान में सर्वाधिक गवेषित ( explored ) क्षेत्र माना जाता था। किंतु उसके नियमों के बारे में हाल में की गई खोजों ने उसको फिर से प्रमुखता प्रदान कर दी है। ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों, जिनमें प्रोद्योगिकी ( technology ) जैसे मनोवैज्ञानिक शोध से स्पष्टतः दूर का वस्ता रखने वाले क्षेत्र भी शामिल हैं, प्रगति का निर्धारण आज स्मृति से संबंधित इन खोजों के परिणामों से हो रहा है।

स्मृति से संबंधित समकालीन अध्ययन अपना ध्यान उसके क्रियातंत्रों पर केंद्रित करते हैं और इन क्रियातंत्रों की समझ के बार में वैज्ञानिकों में जो मतभेद हैं, वे ही स्मृति विषयक विभिन्न सिद्धांतों का आधार बने हैं। विभिन्न शाखाओं के विशेषज्ञों द्वारा अपने अनुसंधानों का दायरा बढ़ाये जाने के कारण बहुत सारी तरह-तरह की प्राक्कल्पनाएं ( hypothesis ) तथा मॉडल प्रतिपादित किये गये हैं। दो परंपरागत स्तरों, मनोवैज्ञानिक तथा तंत्रिकाक्रियात्मक स्तरों, के अलावा जीवरासायनिक स्तर पर भी स्मृति विषयक शोध किये जा रहे हैं। स्मृति के क्रियातंत्रों और नियमसंगतियों के बारे में एक अन्य उपागम, साइबरनेटिकी ने भी तेज़ी से प्रमुखता पाई है।

अगली बार हम स्मृति के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर एक संक्षिप्त अवलोकन प्रस्तुत करेंगे, और स्मृति की प्रक्रिया को समझने की कोशिश जारी रखेंगे।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 9 मार्च 2011

एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष की प्रत्यक्षकर्ता पर निर्भरता पर विचार किया था, इस बार हम एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष
प्रत्यक्ष में प्रेरक-घटकों की भूमिका
( role of motivational components in perception )

प्रत्यक्ष एक विशेष प्रकार की क्रिया है, जिसका लक्ष्य वस्तु का अन्वेषण ( exploration ) तथा उसका समेकित परावर्तन है। प्रत्यक्ष का एक अनिवार्य घटक ( component ) गतिशीलता है। वस्तु को हाथ से अनुभव करना, उसकी दृश्य रूपरेखा पर नज़र दौड़ाना, कंठ से ध्वनि निकालना गतिपरक क्रियाओं की मिसालें है।

स्पर्श की क्रिया में प्रेरक-घटकों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। ज्ञात है कि मनुष्य के शरीर के सारी त्वचा में निष्क्रिय ( passive ) स्पर्श की क्षमता होती है। किंतु अधिकतम प्रभावी सक्रिय ( active ) स्पर्श होता है और वह हाथ की त्वचा की एक विशेषता है। इसीलिए किसी भी वस्तु की सतह पर हाथ की गति उसका पूर्ण परावर्तन सुनिश्चित करती है। आंख और हाथ के कार्यों में काफ़ी समानता है। हाथ की भांति आंख भी चित्र अथवा वस्तु की रूपरेखा को जांचती और ‘टटोलती’ है। देखते समय आंख की और टटोलते समय हाथ की गतिपरक प्रतिक्रियाएं प्रयोजन की दृष्टि से बिल्कुल समान है। हाथ आंख को अन्वेषण की प्रणाली, कार्यनीति और व्यूहनीति सिखाता है।

स्पर्श की प्रक्रिया में हाथ की गतियों और देखने की प्रक्रिया में आंख की गतियों के विश्लेषण ने दिखाया है कि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में खोजने, रखने तथा सही करने से संबंधित गतियां आती हैं, जिनके ज़रिए हाथ प्रत्यक्ष की दत्त वस्तु को खोजता, अपने को ‘मूल स्थिति’ में रखता और इस स्थिति को सही करता है ( ऐसा ही आंख के साथ भी होता है )। दूसरी श्रेणी में बिंब के निर्माण, वस्तु की अवस्थिति ( location ) के निर्धारण, परिचित वस्तुओं की पहचान, आदि में भाग लेने वाली गतियां आती हैं। इन्हें संज्ञानात्मक गतियां या प्रात्यक्षिक क्रियाएं कहा जाता है।

मनुष्य के प्रत्यक्षमूलक बिंब की पूर्णता के मापदंड उसके परिवेश तथा शिक्षा पर निर्भर होते हैं और स्थिर नहीं रहते। इसकी पुष्टि, मिसाल के लिए, उन लोगों के ऑपरेशन के बाद के अनुभव से भी होती है, जो जन्म से अंधे थे और जिन्होंने बहुत वर्षों बाद अपनी आंखों का इलाज करवाया था।

१० महिने की अवस्था में अंधे हुए और ५१ वर्ष की अवस्था में जाकर पुनः दृष्टिलाभ करनेवाले एक रोगी के मामले में पाया गया कि ऑपरेशन के बाद जब उसकी आंखों से पट्टियां खोली गईं, तो उसे धुंधली रूपरेखाओं के अलावा कुछ न दिखाई दिया। उसे वस्तुओं की दुनियां वैसी नहीं दिखाई दी, जैसी हमें आंखें खोलने पर दिखाई देती है। शनैः शनैः उसकी दृष्टि लौट आई, किंतु विश्व उसे फिर भी धुंधला तथा अस्पष्ट दिखता रहा। बहुत समय तक उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष  उसके पहले के स्पर्शमूलक प्रत्यक्ष के अनुभवों तक सीमित रहा। वह आंखों से देखकर पढ़ना न सीख पाया, उसके बनाए चित्र दिखाते थे कि वह ऐसी वस्तुओं के चित्र नहीं बना सकता, जिन्हें उसने स्पर्श के ज़रिए नहीं जाना था। दृष्टिलाभ के एक वर्ष बाद भी वह किसी पेचीदी वस्तु का चित्र तब तक नहीं बना सकता था, जब तक पहले उसे हाथ से पूरी तरह टटोल न ले।

इस तरह के अनुभव बताते है कि प्रत्यक्ष की क्षमता केवल सीखने से आती है। प्रत्यक्ष प्रात्यक्षिक क्रियाओं की पद्धति है और ऐसी क्रियाएं सीखने के लिए विशेष प्रशिक्षण तथा अभ्यास की आवश्यकता होती है।

प्रेक्षण
( observation )

प्रेक्षण ( observation ) ऐच्छिक प्रत्यक्ष का एक महत्त्वपूर्ण रूप और बाह्य विश्व की वस्तुओं तथा परिघटनाओं का सोद्देश्य तथा सुनियोजित अवबोधन है। प्रेक्षण में प्रत्यक्ष एक स्वतंत्र क्रिया का रूप ले लेता है। प्रेक्षण के लिए मनुष्य को अपनी स्पर्श, दृष्टि, श्रवण, आदि इंद्रियों का बखूबी इस्तेमाल करना आना चाहिए। हम प्रायः विदेशी भाषा की अलग-अलग ध्वनियों के बीच भेद नहीं करते, संगीत रचना में ग़लत सुर को नहीं देखते। प्रेक्षण सीखा जा सकता है और ज़रूर सीखा जाना चाहिए। परिष्कृत वाक् ( refined speech ) जैसे परिष्कृत प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण भी हो सकते हैं। इस संबंध में एक मानवश्रेष्ठ ने जो कि प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी थे, कहा है: ‘देख पाना आपके अपने हाथ में है। इसके लिए आपको अपनी आंखों पर बस वह जादू की छड़ी घुमानी होगी, जिसपर लिखा है: मैं जानता हूं कि मैं क्या देख रहा हूं।’

सचमुच प्रेक्षण में सफलता काफ़ी हद तक अपने कार्यभार ( assignment ) के स्पष्ट निर्धारण पर निर्भर होती है। प्रेक्षक को एक क़ुतुबनुमा ( compass ) की आवश्यकता होती है, जो उसे प्रेक्षण की दिशा दिखा सके। कार्यभार अथवा प्रेक्षण की योजना ऐसी ही क़ुतुबनुमा है।

प्रेक्षण में प्रारंभिक तैयारी और प्रेक्षक का विगत अनुभव तथा ज्ञान बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मनुष्य जितना ही अनुभवी तथा जानकार होगा, उसका प्रत्यक्ष उतना ही पूर्ण होगा। अपने छात्रों की सक्रियता का संगठन व निदेशन करते हुए शिक्षक को प्रेक्षण के इन नियमों को ध्यान में रखना चाहिए। छात्र नई सामग्री को समझ सकें, यह सुनिश्चित करने के लिए शिक्षक को उन्हें इसके लिए तैयार करना, उनके विगत अनुभव को सक्रिय बनाना, इसे नई सामग्री से जोड़ने में उनकी मदद करना और उनके सामने नये कार्यभार रखकर उनके ध्यान को उस दिशा में प्रवृत्त करना चाहिए। प्रेक्षण को किसी निश्चित दिशा में मोड़ने और नई सामग्री में पैठ बनाने का एक अन्य ज़रिया शिक्षण में दॄश्यता (visualization) के सिद्धांत को अधिकतम लागू करना है।

शिक्षण में दॄश्यता शिक्षक के शब्दों के साथ विशेष साधनों ( दृश्य सामग्री, विशेष उपकरण, निदर्शन ( simile ), यात्राएं व भ्रमण, आदि ) का संयोजन करके हासिल की जाती हैं। आजकल नई जानकारी के आत्मसात्करण में दृश्यता सिद्धांत के इस तरह के क्रियान्वयन से बेहतर परिणाम हासिल करने के कई नये पहलू सामने आ रहे हैं। शिक्षण को यों संगठित किया जाना चाहिए वह छात्र की ओर से चिंतन की एक सक्रिय प्रक्रिया हो। इस सक्रियता का परिणाम छात्रों द्वारा नई सामग्री का आत्मसात्करण होता है और यही शिक्षण का लक्ष्य भी है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 2 मार्च 2011

प्रत्यक्ष की निर्भरता ( dependence of perception )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष की स्थिरता और सार्थकता पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष की प्रत्यक्षकर्ता पर निर्भरता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रत्यक्ष की निर्भरता
( dependence of perception )

प्रत्यक्ष क्षोभकों पर ही नहीं, प्रत्यक्षकर्ता पर भी निर्भर होता है। प्रत्यक्ष अपने आप में आंख या कान द्वारा नहीं, बल्कि एक निश्चित जीवित मनुष्य द्वारा किया जाता है। प्रत्यक्ष सदा किसी न किसी हद तक प्रत्यक्षकर्ता के व्यक्तित्व, उसकी विशेषताओं, प्रत्यक्ष की वस्तु के प्रति उसके रवैये, आवश्यकताओं, रुचियों, इच्छाओं, आकांक्षाओं तथा भावनाओं के प्रभाव को व्यक्त करता है। प्रत्यक्ष की, प्रत्यक्षकर्ता के मानसिक जीवन तथा उसके व्यक्तित्व की अंतर्वस्तु पर निर्भरता को सामान्यतः समवबोधन अथवा संप्रत्यक्ष कहते हैं

बहुसंख्य अध्ययन दिखाते हैं कि मनुष्य द्वारा देखा हुआ चित्र क्षणिक संवेदनों का योगफल नहीं होता, उसमें प्रायः ऐसी चीज़ें भी होती हैं कि जो प्रत्यक्षण के क्षण में मनुष्य के दृष्टिपटल पर होती ही नहीं, किंतु जिन्हें वह जैसे कि अपने पहले से अनुभव की वजह से देखता है।

प्रत्यक्ष एक सक्रिय प्रक्रिया है, जो मनुष्य को प्राक्कल्पनाओं ( hypothesis ) के निर्माण व जांच के लिए सामग्री प्रदान करती है। किंतु इन प्राक्कल्पनाओं की अंतर्वस्तु मनुष्य के विगत अनुभव पर निर्भर करती है। जब किसी आदमी को सीधी रेखाओं और वक्रों के कई यादृच्छिक ( random ) संयोजन दिखाए जाते हैं और पूछा जाता है कि ‘वह क्या हो सकता है ?’, तो उसके प्रत्यक्ष में शुरु से ही उन शीर्षों की खोज शामिल रहती है, जिनके अंतर्गत दत्त आकृतियों को रखा जा सकता है। उसका मस्तिष्क अनेक प्राक्कल्पनाएं पेश करता तथा जांचता है और आकृति को इस या उस श्रेणी से जोड़ने का प्रयत्न करता है।

इस प्रकार किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष विगत प्रत्यक्षों के निशानों को सक्रिय बनाता है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि एक ही वस्तु का अलग-अलग मनुष्यों द्वारा अलग-अलग ढंग से प्रत्यक्ष किया जाता है। प्रत्यक्ष मनुष्य के विगत अनुभव पर निर्भर होता है। मनुष्य का अनुभव तथा ज्ञान जितना ही समृद्ध होगा, उसका प्रत्यक्ष उतना ही बहुआयामी ( multidimensional ) होगा और वस्तु में वह उसकी उतनी ही ज़्यादा विशेषताएं देखेगा।

प्रत्यक्ष की अंतर्वस्तु ( content ) भी मनुष्य के कार्यभार ( assignment ) से, उसकी सक्रियता के अभिप्रेरकों ( motives ) से निर्धारित होती है। उदाहरण के लिए, जब हम आर्केस्ट्रा द्वारा बजाई जा रही कोई संगीत रचना सुनते हैं, तो हम सारी रचना को उसकी समग्रता में और अलग-अलग वाद्ययंत्रों की ध्वनियों में भेद किये बिना ग्रहण करते हैं। किसी निश्चित वाद्ययंत्र द्वारा निभाई जानेवाली भूमिका हमारी चेतना में प्रमुखता तभी पायेगी और पृथक प्रत्यक्षण की वस्तु तभी बनेगी, जब हम अपने सामने ठीक ऐसा ही कार्यभार निश्चित करेंगे। तब और बाकी सभी कुछ प्रत्यक्ष की पृष्ठभूमि ( background ) में होगा।

इसी तरह प्रत्यक्ष की अंतर्वस्तु को प्रभावित करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण कारक प्रत्यक्षकर्ता का रवैया ( attitude ) है, साथ ही यह भी कि प्रत्यक्ष की क्रिया में भाग लेने वालों संवेगों द्वारा भी प्रत्यक्ष की अंतर्वस्तु को बदला जा सकता है। मनुष्य के विगत अनुभव, अभिप्रेरकों तथा कार्यभारों और उसकी संवेगात्मक अवस्था ( और यहां विश्वास, विश्व-दृष्टिकोण, रुचियों, आदि को भी शामिल किया जा सकता है ) का प्रभाव स्पष्टतः दिखाता है कि प्रत्यक्ष एक सक्रिय प्रक्रिया है और उसे नियंत्रित किया जा सकता है

संवेदन की भांति प्रत्यक्ष भी एक परावर्तनात्मक प्रक्रिया ( reflectional process ) है। यह अनुकूलित प्रतिवर्तों ( conditioned reflexes ) पर आधारित होता है, जो बाह्य विश्व की वस्तुओं अथवा परिघटनाओं की विश्लेषक ग्राहियों पर क्रिया के उत्तर में प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध की प्रांतस्था में बननेवाले कालिक तंत्रिका-संबंध हैं। विश्लेषण ( analysis ) करते हुए मस्तिष्क प्रत्यक्ष की वस्तु का अभिज्ञान ( recognition ) और पृष्ठभूमि से पृथक्करण ( separation ) करता है और इसके बाद उसकी सभी विशेषताओं का एक समेकित बिंब में संश्लेषण ( synthesis ) करता है।

संवेदनों की तुलना में प्रत्यक्ष मस्तिष्क की विश्लेषणमूलक तथा संश्लेषणमूलक सक्रियता का उच्चतर रूप है। विश्लेषण के बिना सार्थक प्रत्यक्ष असंभव है। यही कारण है कि अज्ञात विदेशी भाषा उसके श्रोता को ध्वनियों की एक अनवरत धारा के अलावा कुछ नहीं लगती। उन ध्वनियों को सार्थक बनाने यानी समझ पाने के लिए उन्हें अलग-अलग वाक्यों तथा शब्दों में तोड़ना आवश्यक है। फिर भी वाक्-प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में विश्लेषण और संश्लेषण, दोनों काम साथ-साथ चलते हैं, जिससे हम पृथक असंबद्ध ध्वनियों को नहीं, बल्कि शब्दों तथा वाक्यों को ग्रहण करते तथा समझते हैं।

संवेदनों की भांति ही प्रत्यक्षों का वर्गीकरण भी प्रत्यक्षण में भाग लेने वाले विश्लेषकों के भेद पर आधारित है। यह देखते हुए कि किस प्रत्यक्ष में कौन-सा विश्लेषक मुख्य भूमिका अदा करता है, हम प्रत्यक्षों को चाक्षुष, श्रवणमूलक, स्पर्शमूलक, गतिबोधक, घ्राणमूलक और आस्वादमूलक प्रत्यक्षों में विभाजित करते हैं। सामान्यतः प्रत्यक्ष परस्परक्रिया करने वाले कई विश्लेषकों के कार्य का परिणाम होता है। गतिबोधक ( पेशीय ) संवेदन न्यूनाधिक मात्रा में सभी प्रकार के प्रत्यक्षों में भाग लेते हैं। एक ही प्रकार का प्रत्यक्ष विरले ही मिलता है। आम तौर पर सभी प्रत्यक्ष, विभिन्न प्रकार के प्रत्यक्षों का सम्मिश्रण ही होते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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